लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने रीवा के एक वकील के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म और एससी/एसटी एक्ट से जुड़े मामले में FIR रद्द करने से इनकार कर दिया है। जस्टिस हिमांशु जोशी की अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर हैं और मामला अभी जांच के प्रारंभिक चरण में है। ऐसे में इस स्तर पर पुलिस जांच में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।
मामला रीवा के चोरहटा थाना क्षेत्र में दर्ज FIR से जुड़ा है। शिकायत में वकील पर शादी का झांसा या दबाव बनाकर बार-बार शारीरिक संबंध बनाने तथा गर्भ ठहरने के बाद दवाइयां खिलाकर गर्भपात कराने सहित गंभीर आरोप लगाए गए हैं। वकील ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR और उसके आधार पर चल रही कार्रवाई को चुनौती दी थी।
वकील ने FIR को बताया बदले की कार्रवाई
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने संबंधित महिला का एक पारिवारिक विवाद से जुड़े मामले में वकील के रूप में प्रतिनिधित्व किया था। बाद में उन्होंने केस से खुद को अलग करते हुए NOC दे दी थी। वकील का दावा था कि इसी बात से नाराज होकर महिला ने उनके खिलाफ झूठी और दुर्भावनापूर्ण FIR दर्ज कराई है। याचिका में महिला पर पूर्व में भी अन्य लोगों के खिलाफ झूठी शिकायतें करने और एससी/एसटी एक्ट के कथित दुरुपयोग के आरोप लगाए गए।
हाईकोर्ट ने कहा- वकील-क्लाइंट संबंध से आरोप झूठे नहीं हो जाते
हाईकोर्ट ने वकील की ओर से दी गईं दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच पहले वकील-क्लाइंट का संबंध था, बाद में लगाए गए अपराध के आरोपों को झूठा नहीं माना जा सकता। अदालत ने FIR में 26 दिसंबर 2024, 4 जनवरी 2025 और 15 फरवरी जैसी तारीखों का उल्लेख होने पर भी ध्यान दिया। पीड़िता के बयान दर्ज होने और मेडिकल जांच हो जाने के कारण अदालत ने माना कि मामले के वास्तविक तथ्यों का पता लगाने के लिए पुलिस जांच आवश्यक है।
निष्पक्ष जांच के लिए पहले ही नियुक्त हो चुकी हैं जांच अधिकारी
हाईकोर्ट ने यह भी रिकॉर्ड पर लिया कि रीवा जोन के आईजी ने 4 जून 2026 को निष्पक्ष जांच के लिए मनगवां की एसडीओपी प्रतिमा शर्मा को जांच अधिकारी नियुक्त किया था। अदालत ने जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि मामले से संबंधित पुराने दस्तावेजों और उपलब्ध सभी साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष तरीके से जांच पूरी की जाए।
हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका खारिज की
अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर आरोपों की जांच से केवल आरोपी के पेशे या प्रतिष्ठा के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। मामले में जांच अभी प्रारंभिक स्तर पर होने के कारण हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता महेश शुक्ला और प्रतिवादी महिला की ओर से अधिवक्ता लवकुश मिश्रा ने पक्ष रखा।
