LAW'S VERDICT

इंदौर हाईकोर्ट ने कहा- आत्महत्या से पहले भेजे WhatsApp मैसेज मृत्यु पूर्व बयान जैसा

हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों की जमानत खारिज की

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर। 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में तीन आरोपियों की जमानत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की अदालत ने कहा कि मृतक द्वारा आत्महत्या से ठीक पहले अपने पिता को भेजे गए व्हाट्सएप संदेश प्रथम दृष्टया मृत्यु पूर्व कथन (Dying Declaration) के समान महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य हैं, जिन्हें इस चरण पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जस्टिस पिल्लई ने विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, धार द्वारा 30 जून 2026 को पारित जमानत निरस्त करने के आदेश को सही ठहराते हुए आरोपियों की अपील खारिज कर दी।

आरोपी धर्मेंद्र जाट, उमेश और करण ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 14(A) के तहत हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की थी। इनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 108 (आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण) तथा एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत अपराध दर्ज है।

भील समुदाय का था मृतक 

बदनावर थाना के सहायक उप निरीक्षक सुरेश सिंह कुशवाह को बीएनएसएस की धारा 194 के तहत मर्ग जांच सौंपी गई थी। जांच के दौरान पता चला कि मृतक संतोष उर्फ लखन, उम्र 25 वर्ष, निवासी ग्राम झरीपाड़ा, जिला धार, भील समुदाय से था। पोस्टमार्टम मेडिकल बोर्ड ने मृत्यु का कारण फांसी के कारण दम घुटना (Asphyxia) बताया।

परिवार ने लगाए गंभीर आरोप

मृतक के पिता भूरालाल आउसरी और भाई भीमा आउसरी ने अपने बयान में कहा कि करण,धर्मेंद्र और उमेश पुराने कृषि भूमि विवाद को लेकर लगातार मृतक को धमकाते, अपमानित करते और जान से मारने की धमकी देते थे। परिजनों के अनुसार लगातार प्रताड़ना से परेशान होकर संतोष ने आत्महत्या कर ली।

WhatsApp मैसेज बना सबसे अहम साक्ष्य

जांच के दौरान मृतक के मोबाइल का पंचनामा तैयार किया गया। इसमें पाया गया कि 7 मई 2026 की रात आत्महत्या से ठीक पहले मृतक ने अपने पिता के मोबाइल नंबर पर लगातार तीन व्हाट्सएप संदेश भेजे थे।

मैसेज में लिखा था—

"Papa maryu" (10:52 PM)
"karna hai Umesh Darmendr" (10:53 PM)
"3no" (10:53 PM)

हाईकोर्ट ने कहा कि यह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रथम दृष्टया मृतक द्वारा मृत्यु से पूर्व आरोपियों का नाम लेने वाला महत्वपूर्ण साक्ष्य है।

आरोपियों की दलील

आरोपियों की ओर से तर्क दिया गया कि मोबाइल का CAF रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। भूमि विवाद के दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। साथ ही आरोपी उमेश और मृतक के बीच मित्रवत संबंध थे। इसलिए अभियोजन की कहानी संदेहास्पद है और जमानत दी जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा- नहीं हो सकता मिनी ट्रायल 

हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत पर विचार करते समय अदालत मिनी ट्रायल नहीं कर सकती और न ही साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन किया जा सकता है। अदालत ने माना कि मृतक का व्हाट्सएप संदेश, परिजनों के बयान, तथा लगातार प्रताड़ना के आरोप मिलकर आरोपियों के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मजबूत मामला (Prima Facie Case) स्थापित करते हैं। इन परिस्थितियों में बचाव पक्ष की दलीलें विचारण (Trial) के दौरान परखी जाएंगी, जमानत के स्तर पर नहीं।

कोर्ट का जमानत देने से इनकार

हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विशेष न्यायालय द्वारा जमानत आवेदन खारिज करने का आदेश पूरी तरह उचित है। इसी आधार पर जस्टिस पिल्लई ने तीनो आरोपियों की जमानत अपील खारिज करके विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी (POA) एक्ट, धार के आदेश को बरकरार रखा।

फैसले का महत्व

यह आदेश स्पष्ट करता है कि आत्महत्या से पहले भेजे गए इलेक्ट्रॉनिक संदेश, विशेषकर यदि उनमें आरोपियों का स्पष्ट उल्लेख हो, तो वे जमानत के स्तर पर भी महत्वपूर्ण प्रथम दृष्टया साक्ष्य माने जा सकते हैं। साथ ही, अदालत ने दोहराया कि जमानत सुनवाई के दौरान साक्ष्यों की विस्तृत जांच नहीं की जाती, बल्कि केवल यह देखा जाता है कि अभियोजन का प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।


हाईकोर्ट का आदेश देखें    Cr.A. NO. 5816/2026

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