LAW'S VERDICT

एमपी हाईकोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ का ऐतिहासिक फैसला: ठेकेदारों की ब्लैकलिस्टिंग 'सिविल मरण' जैसा

4-1 के बहुमत से सुनाये फैसले में कहा- ट्रिब्यूनल नहीं, रिट याचिका ही सही उपाय

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर। 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की पांच न्यायाधीशों की वृहद (संविधान) पीठ ने सरकारी ठेकेदारों की ब्लैकलिस्टिंग (Blacklisting) से जुड़े विवादों पर 262 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करना केवल अनुबंध (Contract) से जुड़ा विवाद नहीं, बल्कि उसके नागरिक एवं व्यावसायिक अधिकारों पर गंभीर प्रहार है। संविधान पीठ ने इसे 'सिविल मरण (Civil Death)' की संज्ञा दी और कहा कि ऐसे मामलों में मध्य प्रदेश मध्यस्थम अधिकरण अधिनियम, 1983 के तहत गठित आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र नहीं बनता। प्रभावित ठेकेदार सीधे हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226/227 के तहत रिट याचिका दायर कर सकते हैं।

इस ऐतिहासिक फैसले में कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया, न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल, न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर, न्यायमूर्ति विनय सराफ एवं न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी शामिल थे4-1  के बहुमत वाले  जजों में एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया, जस्टिस सुबोध अभ्यंकर, जस्टिस विनय सराफ और जस्टिस आलोक अवस्थी थे, वहीं जस्टिस विवेक अग्रवाल विरोध में। 

क्या था पूरा मामला?

विवाद मेसर्स नितिन एंटरप्राइजेज (प्रोपराइटर नितिन लोधवाल) की याचिका से जुड़ा था। इंदौर नगर निगम ने वर्ष 2019 में वार्ड-21, जोन-5 स्थित अमरापुरी रोड पर सीमेंट कंक्रीट सड़क निर्माण के लिए टेंडर जारी किया था। सबसे कम बोलीदाता होने के कारण 23 मार्च 2020 को यह कार्य नितिन एंटरप्राइजेज को सौंपा गया। अनुबंध के अनुसार कार्य 240 दिनों में पूरा होना था, लेकिन समयसीमा में कार्य पूरा नहीं होने का हवाला देते हुए 30 अक्टूबर 2020 को नगर निगम के कार्यपालन/अधीक्षण यंत्री ने एक कॉम्पोजिट (Composite) आदेश जारी कर ठेका समाप्त (Termination) करके ठेकेदार को तीन वर्ष के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया तथा बैंक गारंटी एवं एफडीआर जब्त कर ली। जब ठेकेदार ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी तो नगर निगम ने प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि मामला मध्यस्थम अधिकरण अधिनियम, 1983 के अंतर्गत ट्रिब्यूनल के समक्ष जाना चाहिए।

पूर्व में गौरी गणेश श्री बालाजी कंस्ट्रक्शंस, अवस्थी ब्रदर्स और विवा हाईवेज लिमिटेड मामलों में अलग-अलग फुल बेंच के निर्णय होने के कारण यह मामला पांच जजों की संविधान पीठ को भेजा गया था।

फैसले के प्रमुख निष्कर्ष

1. ब्लैकलिस्टिंग राज्य की प्रशासनिक शक्ति

अदालत ने कहा कि किसी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 298 के तहत राज्य की प्रशासनिक एवं कार्यकारी शक्ति से उत्पन्न होती है।

2. केवल मुख्य अभियंता कर सकते हैं ब्लैकलिस्ट

संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि 24 मार्च 2015 के पीडब्ल्यूडी परिपत्र के अनुसार अंतिम ब्लैकलिस्टिंग आदेश केवल मुख्य अभियंता (Chief Engineer) या उनके समकक्ष अधिकारी ही पारित कर सकते हैं। अन्य अधिकारी केवल इसकी अनुशंसा कर सकते हैं।

3. ब्लैकलिस्टिंग है 'सिविल मरण'

बेंच ने कहा कि ब्लैकलिस्टिंग किसी ठेकेदार की प्रतिष्ठा, व्यापारिक साख और भविष्य के सरकारी कार्यों के अवसरों को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। इस प्रकार की क्षति का मूल्यांकन केवल धनराशि में नहीं किया जा सकता। इसलिए इसे अदालत ने "Civil Death" अर्थात "सिविल मरण" माना।

4. ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र से बाहर

पीठ ने कहा कि ब्लैकलिस्टिंग को चुनौती देना मध्यस्थम अधिकरण अधिनियम, 1983 की धारा 2(1)(d) के अंतर्गत "विवाद" की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए ऐसे मामलों की सुनवाई स्टेट आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल नहीं करेगा।

5. पुराने फैसलों पर स्पष्टता

हाईकोर्ट ने कहा कि गौरी गणेश तथा अवस्थी ब्रदर्स मामलों में दिया गया यह सिद्धांत सही कानून नहीं माना जा सकता कि ब्लैकलिस्टिंग केवल अनुबंध समाप्ति का परिणाम (Consequential Relief) है।

वहीं विवा हाईवेज लिमिटेड के निर्णय में अपनाए गए सिद्धांत को सही कानून माना गया।

6. रिट याचिका पूरी तरह सुनवाई योग्य 

अदालत ने कहा कि यदि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ हो, उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया हो अथवा मौलिक अधिकार प्रभावित हुए हों, तो प्रभावित व्यक्ति सीधे अनुच्छेद 226 एवं 227 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर सकता है।

7. सिविल कोर्ट का अधिकार भी बरकरार

पीठ ने यह भी कहा कि अधिनियम की धारा 20 का प्रतिबंध ब्लैकलिस्टिंग से जुड़े मामलों पर लागू नहीं होगा। ऐसे मामलों में आवश्यक परिस्थितियों में सिविल कोर्ट में घोषणा (Declaration) संबंधी वाद भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

8. 2025 संशोधन का असर नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि मध्यस्थम अधिकरण अधिनियम में वर्ष 2025 के संशोधन, जो 30 अप्रैल 2026 से लागू हुए हैं, उनसे ब्लैकलिस्टिंग विवादों की पोषणीयता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। धारा 17-AB के तहत अंतरिम राहत का प्रावधान भी ब्लैकलिस्टेड ठेकेदार की वास्तविक शिकायत का प्रभावी समाधान नहीं है।

व्यापक होगा इस फैसले का प्रभाव

इस निर्णय का प्रभाव मध्य प्रदेश के सभी सरकारी विभागों, नगर निगमों, पीडब्ल्यूडी, जल संसाधन विभाग तथा अन्य सरकारी एजेंसियों द्वारा किए जाने वाले ठेकों पर पड़ेगा।

इस फैसले के बाद—

  • विभागीय अधिकारी मनमाने तरीके से ब्लैकलिस्टिंग नहीं कर सकेंगे।
  • ब्लैकलिस्टिंग से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य होगा।
  • अंतिम आदेश सक्षम स्तर अर्थात मुख्य अभियंता द्वारा ही पारित किया जा सकेगा।
  • प्रभावित ठेकेदारों को ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया से गुजरने के बजाय सीधे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करने का अधिकार मिलेगा।

फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय सरकारी ठेकों से जुड़े कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ब्लैकलिस्टिंग केवल संविदात्मक (Contractual) कार्रवाई नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति के व्यवसाय, प्रतिष्ठा और भविष्य के अवसरों पर गंभीर प्रभाव डालने वाली प्रशासनिक कार्रवाई है। इसलिए ऐसी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में रहेगी और प्रभावित व्यक्ति को सीधे संवैधानिक उपचार (Constitutional Remedy) प्राप्त होगा।

हाईकोर्ट का धुरंधर वकीलों ने रखीं दलीलें 

चूंकि या मामला काफी अहम था, इसीलिए संविधान पीठ ने इस मुद्दे पर हाईकोर्ट की तीनों बेंचों के धुरंधर वकीलों की दलीलें सुनीं। 

याचिकाकर्ता की और से 

  • श्री ए.के. सेठी, वरिष्ठ अधिवक्ता (एमिकस क्यूरी)
  • श्री राहुल सेठी, अधिवक्ता
  • श्री अमित मिश्रा, अधिवक्ता
  • सुश्री आस्था नागौरी, अधिवक्ता

एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae)

  • श्री पीयूष माथुर, वरिष्ठ अधिवक्ता
    • श्री मधुसूदन द्विवेदी, अधिवक्ता
    • श्री अभिषेक बाजपेयी, अधिवक्ता
  • श्री अमित अग्रवाल, वरिष्ठ अधिवक्ता
    • श्री अर्जुन ए. अग्रवाल, अधिवक्ता
    • श्री साविल पराशर, अधिवक्ता
    • श्री गर्वित सिंह, अधिवक्ता
  • श्री वीर कुमार जैन, वरिष्ठ अधिवक्ता
    • श्री वैभव जैन, अधिवक्ता
    • श्री देवाशीष दुबे, अधिवक्ता
  • श्री आर.एस. छाबड़ा, वरिष्ठ अधिवक्ता
    • श्री मुदित महेश्वरी, अधिवक्ता
    • श्री राघव राज सिंहंद, अधिवक्ता

अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता

  • श्री नमन नागरथ, वरिष्ठ अधिवक्ता
    • श्री हर्ष पराशर
    • सुश्री याशिका बोंडवाल, अधिवक्ता
  • श्री शेखर शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता
    • श्री शुभम वर्मा
    • सुश्री अमृता जोशी, अधिवक्ता (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से)

अन्य अधिवक्ता

  • श्री अंशुमान सिंह
  • श्री पीयूष श्रीवास्तव
  • श्री सुयश मोहन गुरु
  • श्री अक्षत अग्रवाल
  • श्री अमित कुमार सिंह

राज्य सरकार की ओर से 

  • श्री प्रशांत सिंह, महाधिवक्ता 
  • सोनल गुप्ता, अतिरिक्त महाधिवक्ता 
  • नीलेश यादव, अतिरिक्त महाधिवक्ता 
  • आशीष यादव, अतिरिक्त महाधिवक्ता 
  • सुदीप भार्गव, उप महाधिवक्ता 

इंदौर नगर निगम की ओर से

  • श्री मनोज मुंशी, वरिष्ठ अधिवक्ता
  • श्री चिन्मय मेहता
  • श्री मयंक मुंशी
  • श्री अमित कुमार सिंह
  • श्री सिद्धार्थ शर्मा, अधिवक्ता

अन्य अधिवक्ता

  • श्री सुमित नेमा, वरिष्ठ अधिवक्ता
  • श्री अनिकेत अभय नाईक, अधिवक्ता
  • श्री अजय मिश्रा, अधिवक्ता
  • श्री नवनीश जौहरी, अधिवक्ता
  • श्री एच.वाई. मेहता, अधिवक्ता
  • श्री रोहित मंगल, अधिवक्ता
  • श्री सोमेश गोभुज, अधिवक्ता
  • श्री पार्थ शर्मा, अधिवक्ता
  • श्री विवेक रंजन पांडेय, अधिवक्ता


संविधान पीठ का फैसला देखें     WP-9623-2021

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