LAW'S VERDICT

धार जेल कस्टोडियल डेथ मामला: हाईकोर्ट ने खारिज की जेल अधीक्षक और डॉक्टर की याचिका, चलेगी CID जांच

इंदौर हाईकोर्ट ने बरकरार राखी FIR और न्यायिक जांच रिपोर्ट 

इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने वर्ष 2023 में धार जिला जेल में हुई एक कैदी की कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तत्कालीन जेल अधीक्षक राजाराम डांगी और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर कमलेश कुमार अहिरवार की ओर से दायर दो रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने न्यायिक मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट और उसके आधार पर दर्ज एफआईआर को प्रथम दृष्टया कानूनसम्मत माना तथा CID जांच में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

मामला धार जिला जेल में बंद भैरू (पिता बगदीराम जी मारू) की मौत से जुड़ा है, जो पोक्सो अधिनियम के तहत सजा काट रहा था। 27 फरवरी 2023 को जेल में तलाशी अभियान के दौरान एक अन्य बंदी से तंबाकू मिलने पर पूछताछ में भैरू का नाम सामने आया। आरोप है कि इसके बाद जेल कर्मचारियों ने उसके साथ लाठियों और पट्टों से बर्बर मारपीट की। शाम को उसकी तबीयत बिगड़ने पर जिला अस्पताल धार ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

न्यायिक जांच में सामने आया कारण 

प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, धार के निर्देश पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 176(1-A) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) द्वारा जांच कराई गई। 3 अप्रैल 2023 को प्रस्तुत जांच रिपोर्ट में कहा गया कि-

  • कैदी की मृत्यु गंभीर शारीरिक चोटों और मारपीट के कारण हुई।
  • जेल अधीक्षक, जेल स्टाफ और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों की भूमिका संदिग्ध पाई गई।
  • घटना के बाद साक्ष्य मिटाने के प्रयास किए गए।
  • घायल कैदी को एक बैरक से दूसरी बैरक में ले जाया गया।
  • उल्टी साफ कराई गई तथा शव को ठंडे स्थान पर रखकर चोटों के निशान छिपाने की कोशिश की गई।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि मेडिकल बोर्ड ने आठ बाहरी चोटों का उल्लेख तो किया, लेकिन मृत्यु का कारण "अज्ञात" बताते हुए पोस्टमार्टम रिपोर्ट अस्पष्ट रखी तथा धुंधली वीडियोग्राफी उपलब्ध कराई। इसी रिपोर्ट के आधार पर 8 मई 2023 को धार कोतवाली में IPC की धारा 304, 201, 218 सहित अन्य धाराओं में अपराध क्रमांक 336/2023 दर्ज किया गया।

हाईकोर्ट में क्या दलील दी गई?

जेल अधीक्षक की ओर से

तत्कालीन जेल अधीक्षक राजाराम डांगी ने दलील दी गई कि  धारा 176(1-A) के तहत मजिस्ट्रेट केवल मृत्यु के कारण की जांच कर सकते हैं। उन्हें किसी व्यक्ति को आरोपी ठहराने या एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार नहीं है। घटना के समय वे मौके पर मौजूद नहीं थे। उनका 32 वर्ष का सेवा रिकॉर्ड बेदाग रहा है।

डॉक्टरों की ओर से

पोस्टमार्टम करने वाले डॉ.  कमलेश कुमार अहिरवार कहा कि उन्होंने निष्पक्षता से पोस्टमार्टम किया। रिपोर्ट में सभी चोटों का उल्लेख किया गया। विसरा रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं किया जा सका।

हाईकोर्ट ने कहा- पूरे घटनाक्रम की जांच कर सकते हैं मजिस्ट्रेट 

हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि CrPC की धारा 176(1-A) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट का अधिकार केवल मृत्यु का कारण जानने तक सीमित नहीं है। हिरासत में मौत के मामलों में मजिस्ट्रेट पूरे घटनाक्रम की जांच कर सकते हैं और जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान भी कर सकते हैं। इस संबंध में अदालत ने राम शरण प्रजापति बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2018) के निर्णय का भी हवाला दिया। अदालत ने यह भी कहा कि प्रत्यक्षदर्शी बंदी के बयान से प्रथम दृष्टया यह सामने आता है कि मारपीट के दौरान जेल अधीक्षक मौके पर पहुंचे थे, लेकिन घायल कैदी को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई।

कोर्ट का CID जांच में हस्तक्षेप से इनकार

हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज होना केवल आपराधिक जांच की प्रारंभिक प्रक्रिया है। मामला पहले से ही सीआईडी को सौंपा जा चुका है और इस स्तर पर रिट याचिका के माध्यम से जांच को रोकना उचित नहीं होगा। अदालत ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि वह बिना किसी बाहरी प्रभाव के निष्पक्ष एवं शीघ्र जांच पूरी करे।हाईकोर्ट ने यह नहीं स्पष्ट किया कि न्यायिक जांच रिपोर्ट और उसके आधार पर दर्ज एफआईआर में कोई ऐसा कानूनी दोष नहीं है जिसके आधार पर उन्हें निरस्त किया जाए। इसलिए दोनों रिट याचिकाएं खारिज करते हुए जांच को आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई।


हाईकोर्ट का आदेश देखें      W.P. NO. 15267/2023

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