विभाग की चूक से मिला अधिक वेतन वापस नहीं लिया जा सकता, कर्मचारी की कोई भूमिका नहीं थी: हाईकोर्ट
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि विभाग की गलती से किसी कर्मचारी का वेतन गलत तरीके से निर्धारित हो जाता है, तो उसकी सजा कर्मचारी को नहीं दी जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस कर्मचारी की वेतन निर्धारण प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं थी, उससे अतिरिक्त भुगतान की वसूली करना कानूनन उचित नहीं है।
जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए एक असिस्टेंट कमांडेंट से करीब ₹2.25 लाख की ब्याज सहित प्रस्तावित वसूली को अवैध ठहरा दिया।
क्या है पूरा मामला?
मामला शहडोल जिले में पदस्थ असिस्टेंट कमांडेंट मनोज कुमार सिंह के वेतन निर्धारण से जुड़ा है। सरकारी नियमों के अनुसार सब-इंस्पेक्टरों के लिए संशोधित वेतनमान 1 सितंबर 2007 से लागू होना था। लेकिन विभागीय त्रुटि के कारण मनोज कुमार सिंह को यह लाभ 1 अप्रैल 2006 से ही दे दिया गया। बाद में विभाग ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए अप्रैल 2006 से अगस्त 2007 तक दी गई अतिरिक्त राशि की ब्याज सहित वसूली के आदेश जारी कर दिए। इस रिकवरी आदेश को मनोज कुमार सिंह ने वर्ष 2020 में हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने 16 अप्रैल 2024 को उनके पक्ष में फैसला दिया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की।
सरकार की दलील अदालत ने ठुकराई
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि संबंधित वेतनमान निर्धारित तिथि से पहले लागू नहीं किया जा सकता था और विभाग से अतिरिक्त राशि का भुगतान गलती से हुआ है, इसलिए उसकी रिकवरी की जानी चाहिए।हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
'कर्मचारी की कोई भूमिका नहीं थी'
अदालत ने कहा कि मनोज कुमार सिंह न तो आहरण एवं संवितरण अधिकारी (DDO) थे और न ही वेतन निर्धारण संबंधी फाइल पर उनके हस्ताक्षर थे। रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट है कि गलत वेतन निर्धारण में उनकी कोई भूमिका या धोखाधड़ी नहीं थी। ऐसी स्थिति में विभागीय गलती का वित्तीय बोझ कर्मचारी पर डालना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
पुनर्विचार याचिका खारिज
हाईकोर्ट ने कहा कि पहले दिए गए फैसले में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है, इसलिए पुनर्विचार का कोई आधार नहीं बनता। इसी के साथ राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई। मनोज कुमार सिंह की ओर से अधिवक्ता सचिन पांडे ने पैरवी की।
