MP हाईकोर्ट ने नियम-9 को ठहराया वैध, 1 जनवरी 2006 से संशोधित वेतनमान चुनने वाले कर्मचारियों को राहत से इनकार
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के पेंशनर्स को अतिरिक्त वेतनवृद्धि (इंक्रीमेंट) देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन कर्मचारियों ने 1 जनवरी 2006 से संशोधित वेतनमान (Revised Pay Scale) स्वीकार करने का विकल्प स्वयं चुना था, वे बाद में पुरानी वेतन व्यवस्था के तहत मिलने वाली अतिरिक्त वेतनवृद्धि का दावा नहीं कर सकते।
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कहा कि मध्य प्रदेश वेतन पुनरीक्षण नियम, 2009 का नियम-9 न तो मनमाना है और न ही संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
क्या थी पेंशनर्स की मांग?
पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका में नियम-9 को आंशिक रूप से असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जिन कर्मचारियों की वार्षिक वेतनवृद्धि फरवरी से जून 2006 के बीच देय थी, उन्हें 1 जनवरी 2006 को पुरानी वेतनमान में एक अतिरिक्त वेतनवृद्धि देकर वेतन और पेंशन का पुनर्निर्धारण किया जाए तथा बकाया राशि ब्याज सहित प्रदान की जाए।
कोर्ट बोला- कर्मचारियों को दो स्पष्ट विकल्प दिए गए थे
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नियम-9 के तहत कर्मचारियों को दो स्पष्ट विकल्प उपलब्ध थे—
- पहला: 1 जनवरी 2006 से संशोधित वेतनमान स्वीकार कर तत्काल नए वेतनमान का लाभ लेना।
- दूसरा: अपनी अगली वार्षिक वेतनवृद्धि तक पुरानी वेतन व्यवस्था में बने रहना और उसके बाद संशोधित वेतनमान अपनाना।
अदालत ने कहा कि जब कर्मचारी ने अपनी इच्छा से पहला विकल्प चुना, तो वह बाद में पुरानी और नई दोनों वेतन व्यवस्थाओं का एक साथ लाभ नहीं मांग सकता।
नियम-9 को बताया वैध और तार्किक
डिवीजन बेंच ने कहा कि वेतन पुनरीक्षण नियम कर्मचारियों को स्पष्ट और पारदर्शी विकल्प प्रदान करते हैं। विकल्प चुनने के बाद उसके परिणाम भी स्वीकार करने होंगे। इसलिए नियम-9 को मनमाना या भेदभावपूर्ण नहीं कहा जा सकता। इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता अनुभव जैन ने पैरवी की।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-16514-2026
