LAW'S VERDICT

POCSO Case: पहले सामान्य व्यक्ति की तरह लड़ा मुकदमा, अब सजा से बचने के लिए बना 'मूक-बधिर'

हाईकोर्ट ने आरोपी की चालाकी पकड़कर पलटा ट्रायल कोर्ट का फैसला

ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पॉक्सो एक्ट के एक गंभीर मामले में आरोपी की कथित चालाकी को उजागर करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की डिवीज़न बेंच ने माना कि आरोपी ने खुद को मूक-बधिर बताकर न्यायिक प्रक्रिया से बचने का प्रयास किया, जबकि रिकॉर्ड से ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण सामने नहीं आया कि वो वाकई बोलने और सुनने में असमर्थ है। हाईकोर्ट ने स्पेशल पॉक्सो कोर्ट द्वारा धारा 313 सीआरपीसी के तहत आरोपी का बयान दर्ज किए बिना सुनाए गए फैसले को बदलते हुए मामला दोबारा ट्रायल कोर्ट के पास भेज दिया है। ऐसा इसलिए ताकि सुनवाई का मौका न मिलने को आधार बनाकर भविष्य में आरोपी ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती न दे।

7 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म का है मामला

मामला ग्वालियर के थाटीपुर थाना क्षेत्र के अपराध क्रमांक 488/2022 से संबंधित है। अभियोजन के अनुसार आरोपी कल्याण रैकवार पर सात वर्षीय बालिका के साथ घर में घुसकर दुष्कर्म करने का आरोप है। उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 449, 376(AB), 506 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।

धारा 313 के बयान से पहले बदली रणनीति

साक्ष्य पूरे होने के बाद जब आरोपी के धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज किए जाने थे, तब बचाव पक्ष ने दावा किया कि आरोपी मूक-बधिर है और वह न्यायालय की कार्यवाही या सांकेतिक भाषा भी समझने में सक्षम नहीं है। इस आधार पर स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने 14 मई 2024 को आरोपी को दोषी तो माना, लेकिन फैसला सुनाने से पहले सीआरपीसी की धारा 318 के तहत यह रेफ़्रेन्स हाईकोर्ट को भेजा था।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड खंगाला तो खुल गई सच्चाई

हाईकोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड की जांच के दौरान पाया कि आरोपी का दावा कई तथ्यों से मेल नहीं खाता। पीड़िता ने अपने बयान में स्पष्ट कहा कि आरोपी बोल सकता है। किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि आरोपी गूंगा या बहरा है। पुलिस जांच, मेडिकल परीक्षण अथवा किसी मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में भी आरोपी के मूक-बधिर होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। अदालत ने यह भी पाया कि आरोपी वर्ष 2013 के एक अन्य आपराधिक मामले में भी मुकदमा झेल चुका है, जिसमें वर्ष 2014 में उसे सजा हुई थी। उस मुकदमे के दौरान उसने सामान्य रूप से न्यायालय की कार्यवाही में भाग लिया था और धारा 313 के तहत अपने बयान भी दर्ज कराए थे। इतना ही नहीं, 14 जुलाई 2022 को पहली बार न्यायालय में पेशी के दौरान रिमांड आदेश में दर्ज है कि आरोपी से पूछने पर उसने बताया था कि उसे कोई चोट नहीं है। इससे स्पष्ट हुआ कि वह न्यायालय के प्रश्नों को समझ रहा था और उत्तर भी दे रहा था।

सुनने की मशीन लगाने से भी किया इनकार

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि आरोपी को सुनने की मशीन उपलब्ध कराई गई, लेकिन उसने उसे लगाने से इनकार कर दिया। उसने साइन लैंग्वेज विशेषज्ञों और मेडिकल बोर्ड के समक्ष भी सहयोग नहीं किया। अदालत ने इसे आरोपी का कानून की प्रक्रिया से बचने के लिए अपनाया गया चालाकी भरा रवैया बताया।

हाईकोर्ट ने कहा- यह तकनीकी त्रुटि  

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 313 सीआरपीसी के तहत आरोपी का बयान दर्ज किए बिना दोषसिद्धि का निर्णय देना एक तकनीकी त्रुटि थी। यदि इस गलती को नहीं सुधारा जाता तो आरोपी भविष्य में इसी आधार पर पूरी सुनवाई को चुनौती दे सकता था।

हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश

हाईकोर्ट ने स्पेशल पॉक्सो कोर्ट का आदेश संशोधित करते हुए मामला वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी के धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान अनिवार्य रूप से दर्ज किए जाएं। यदि आवश्यकता हो तो लिखित प्रश्नों (Section 313(5) CrPC) अथवा साइन लैंग्वेज विशेषज्ञ की सहायता ली जा सकती है। साथ ही स्पष्ट किया गया कि यदि आरोपी इसके बाद भी जानबूझकर सहयोग नहीं करता है तो पर्याप्त अवसर देने के बाद ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार अंतिम निर्णय पारित करने के लिए स्वतंत्र होगा। हाईकोर्ट ने पूरी प्रक्रिया चार महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश भी दिया है। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपेंद्र सिंह कुशवाहा ने पक्ष रखा।

एमिकस क्यूरी की सराहना

मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता आर.के. शर्मा, वी.डी. शर्मा तथा अधिवक्ता भव्या शर्मा ने एमिकस क्यूरी के रूप में न्यायालय की सहायता की। हाईकोर्ट ने उनके सहयोग की सराहना करते हुए आदेश में विशेष उल्लेख किया।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     CRIMINAL REFERENCE NO. 01 of 2024

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