चेक बाउंस करने पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सेवा में भारी लापरवाही माना और बैंक की अपील खारिज की
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बैंकिंग सेवाओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी पार्टनरशिप फर्म का खाता बाद में प्रोपराइटरशिप (एकल स्वामित्व) में परिवर्तित हो जाता है, तो बैंक केवल खाते का टाइटल बदलने के आधार पर पहले से जारी चेकों का भुगतान रोक नहीं सकता। अदालत ने इसे बैंक की ओर से "सेवा में गंभीर कमी (Deficiency in Service)" माना है। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने बैंक की रिट अपील खारिज करते हुए सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखा।
20 साल पुराने विवाद में आया फैसला
मामले के अनुसार, मैसर्स डागा कॉमर्स के संचालक गिरधर डागा ने 15 अप्रैल 2003 को आर.के. श्रीवास्तव के पक्ष में एक-एक लाख रुपये के दो चेक जारी किए थे। भुगतान के लिए प्रस्तुत किए जाने पर बैंक ने यह कहते हुए चेक लौटा दिए कि खाते का टाइटल संशोधित (Modified) हो चुका है।
बैंक का तर्क था कि संबंधित पार्टनरशिप फर्म 20 दिसंबर 2002 को भंग होकर प्रोपराइटरशिप में बदल गई थी, इसलिए पुराने चेकों का भुगतान नहीं किया जा सकता।
बैंकिंग लोकपाल से हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला
प्रारंभिक सुनवाई में बैंकिंग लोकपाल ने शिकायतकर्ता आर.के. श्रीवास्तव के पक्ष में फैसला दिया था। हालांकि बाद में बैंक की पुनर्विचार याचिका पर लोकपाल ने अपना आदेश बदल दिया। इसके बाद आर.के. श्रीवास्तव ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सिंगल बेंच ने 12 फरवरी 2026 को बैंक को दोषी ठहराते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए बैंक ने डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने बैंक की सभी दलीलें ठुकराईं
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि बैंक की ओर से प्रस्तुत तर्क कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं।
1- चेक धारक भी बैंक सेवा का उपभोक्ता
अदालत ने कहा कि बैंक का यह दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता कि शिकायतकर्ता उसका ग्राहक नहीं था। वैध चेक लेकर भुगतान के लिए आने वाला व्यक्ति भी बैंकिंग सेवा का लाभार्थी और उपभोक्ता माना जाएगा।
2- पुरानी चेक बुक वापस नहीं लेना बैंक की गलती
कोर्ट ने पाया कि खाते की प्रकृति बदलते समय बैंक ने खाताधारक से पुरानी चेक बुक वापस नहीं ली और न ही जारी चेकों को निरस्त किया। जब खाताधारक की ओर से कोई स्टॉप पेमेंट निर्देश नहीं दिया गया था, तब बैंक को चेक भुगतान रोकने का अधिकार नहीं था।
3- लोकपाल के समक्ष भी प्रक्रिया का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि बैंक ने बैंकिंग लोकपाल के समक्ष पुनर्विचार याचिका निर्धारित समय-सीमा के बाद दायर की थी और शिकायतकर्ता को सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया था, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
प्रोपराइटरशिप का अलग कानूनी अस्तित्व नहीं
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रोपराइटरशिप फर्म का अपने स्वामी से अलग कोई स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व नहीं होता। इस मामले में खाता संख्या और हस्ताक्षरकर्ता भी वही थे, इसलिए केवल खाते का शीर्षक बदलने के आधार पर चेक अस्वीकार करना उचित नहीं था।
बैंक को देना होगा चेक राशि और ब्याज
हाईकोर्ट ने बैंक की अपील पूरी तरह खारिज करते हुए सिंगल बेंच द्वारा पारित आदेश को बरकरार रखा। इसके तहत पीड़ित पक्ष को चेक की राशि के साथ ब्याज और निर्धारित मुआवजा देने के निर्देश यथावत रहेंगे।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WA-809-2026
