LAW'S VERDICT

बेटे की गवाही पर पिता की उम्रकैद बरकरार, पत्नी की हत्या मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

“बेटा बिना वजह पिता के खिलाफ झूठ नहीं बोलेगा”, MP हाईकोर्ट ने खारिज की आरोपी की अपील

जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने पत्नी की निर्मम हत्या के मामले में आरोपी पति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि एक बेटा बिना किसी ठोस कारण के अपने पिता के खिलाफ अदालत में झूठ नहीं बोलेगा।

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने कहा कि जिस अपराध में क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गई हों, उसे अचानक हुए विवाद का मामला बताकर सजा कम नहीं की जा सकती।

बेटे ने देखी मां की हत्या

मामला जबलपुर जिले के कुण्डम थाना क्षेत्र के ग्राम बम्हनी टोला का है। अभियोजन के अनुसार आरोपी भागचंद बैगा ने 20 जुलाई 2013 की रात अपनी पत्नी मंगलिया बाई की बका से हमला कर हत्या कर दी थी।

घटना का प्रत्यक्षदर्शी आरोपी का बेटा गणेश था। उसने अदालत को बताया कि मां की चीख सुनकर जब वह आंगन में पहुंचा तो देखा कि उसका पिता लगातार बका से हमला कर रहा था। भय के कारण वह वहां से भाग गया।

इस मामले में जबलपुर की सेशन कोर्ट ने 24 अक्टूबर 2016 को आरोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी।

“10 वार बताते हैं हत्या का इरादा”

अपील में आरोपी पक्ष ने तर्क दिया कि घटना अचानक हुए विवाद का परिणाम थी, इसलिए इसे हत्या नहीं बल्कि गैर-इरादतन हत्या माना जाना चाहिए।

वहीं राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता अजय शुक्ला ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि मृतका के शरीर पर 10 गंभीर घाव पाए गए थे। सिर पर किए गए वार इतने घातक थे कि महिला का मस्तिष्क बाहर आ गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि लगातार 10 वार यह स्पष्ट करते हैं कि आरोपी का इरादा केवल गंभीर चोट पहुंचाना नहीं बल्कि हत्या करना था।

“एक विश्वसनीय गवाह भी पर्याप्त”

फैसले में डिवीजन बेंच ने Amar Singh vs State of Delhi का हवाला देते हुए कहा कि यदि एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी गवाह पूरी तरह विश्वसनीय है और मेडिकल साक्ष्य उसके बयान की पुष्टि करते हैं, तो केवल उसी आधार पर दोष सिद्ध किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि बेटे की गवाही स्वाभाविक और भरोसेमंद है तथा उसके बयान को मेडिकल रिपोर्ट से भी समर्थन मिला है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।


हाईकोर्ट का आदेश देखें   CRA-3509-2016





















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