10 साल बाद दाखिल की गई याचिका खारिज, बर्खास्तगी को सही ठहराया
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने दो से अधिक संतान होने के आधार पर की गई एक कर्मचारी की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। करीब 10 साल की देरी से दायर याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कहा कि सेवा शर्तों का उल्लंघन होने पर राहत नहीं दी जा सकती।
2015 में हुई थी अस्थाई नियुक्ति
रीवा जिले के ग्राम पड़रिया निवासी बृजलाल साकेत ने याचिका दायर कर अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी। 20 जनवरी 2015 को रीवा जिला न्यायालय में ड्राइवर पद पर अस्थायी नियुक्ति मिली थी। नियुक्ति आदेश में स्पष्ट शर्त—दो से अधिक संतान नहीं होनी चाहिए। नौकरी के महज 89 दिनों के भीतर तीसरी संतान होने के आधार पर 3 दिसंबर 2015 को उसकी सेवा समाप्त कर दी गई3 दिसंबर 2015 को इसके बाद याचिकाकर्ता रोज़गार की तलाश में सूरत चला गया और मजदूरी करने लगा।
10 साल बाद हाईकोर्ट की शरण
याचिकाकर्ता को वर्ष 2018 में हाईकोर्ट के एक फैसले की जानकारी मिली, जिसमें तीसरी संतान के बावजूद पुनर्बहाली का आदेश दिया गया था। इसी आधार पर उसने वर्ष 2025 में याचिका दायर की।
कोर्ट ने खारिज की याचिका
सुनवाई के दौरान अनावेदकों की ओर से अधिवक्ता संदीप शुक्ला ने पक्ष रखा। डिवीजन बेंच ने सभी तथ्यों पर विचार करते हुए कहा कि नियुक्ति आदेश में दो से अधिक संतान पर स्पष्ट प्रतिबंध था। याचिकाकर्ता इस शर्त का उल्लंघन कर रहा था। उसकी बर्खास्तगी 2015 में हुई और याचिका वर्ष 2025 में दायर की गई। लगभग 10 वर्ष की देरी को कोर्ट ने गंभीर माना और कहा कि इतने लंबे समय में संबंधित पद भर भी गया होगा।
हाईकोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण संदेश देता है कि-
- सरकारी नौकरी में नियम सर्वोपरि हैं।
- गलत पात्रता के आधार पर मिली नौकरी सुरक्षित नहीं रहती।
- और सबसे जरूरी न्याय के लिए समय पर याचिका दायर करना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-1756-2025
