LAW'S VERDICT

“महाधिवक्ता की मंजूरी जरूरी”: हाईकोर्ट ने क्रिमिनल कंटेम्प्ट याचिका खारिज की

जबलपुर | मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में साफ किया है कि महाधिवक्ता की सहमति के बिना क्रिमिनल कंटेम्प्ट (आपराधिक अवमानना) याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। इसी आधार पर अदालत ने शहडोल जिला बार अध्यक्ष के खिलाफ दायर याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया

चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि बिना महाधिवक्ता (Advocate General) की पूर्व सहमति के क्रिमिनल कंटेम्प्ट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। सिर्फ महाधिवक्ता कार्यालय को पत्र भेजना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

रिटायर्ड ASP ने लगाई थी याचिका 

यह याचिका सागर में रहने वाले रिटायर्ड एडिशनल एसपी मनोज वर्मा द्वारा दायर की गई थी। याचिका में आरोप था कि शहडोल जिला बार अध्यक्ष राकेश सिंह ने 17 मार्च 2025 को एक महिला जज के साथ कथित अभद्रता की। याचिका में वकील के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई थी। 

हाईकोर्ट ने क्या कहा? 

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 15(1)(b) का हवाला दिया। इस प्रावधान के अनुसार किसी निजी व्यक्ति द्वारा आपराधिक अवमानना याचिका दाखिल करने से पहले महाधिवक्ता की लिखित सहमति अनिवार्य है।

क्यों खारिज हुई याचिका?

याचिकाकर्ता ने महाधिवक्ता से औपचारिक सहमति प्राप्त नहीं की थी। इस कारण डिवीज़न बेंच ने कहा कि यह  याचिका  मेंटेनेबल (सुनवाई योग्य) नहीं रही। हाईकोर्ट ने प्रारंभिक स्तर पर ही इसे खारिज कर दिया। राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता अनुभव जैन उपस्थित रहे

क्या है इस फैसले का महत्व?

हाईकोर्ट का यह आदेश स्पष्ट करता है कि अदालत की अवमानना जैसे गंभीर मामलों में प्रक्रियात्मक नियमों का सख्ती से पालन जरूरी है। बिना अनुमति के दायर याचिकाएं सीधे खारिज हो सकती हैं। 

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