जबलपुर | पॉक्सो से जुड़े एक अहम मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जब पीड़िता की उम्र ही संदेह के घेरे में हो, तो केवल मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने कहा कि “जब उम्र का आधार ही संदिग्ध हो, तो मार्कशीट को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। ” पीड़िता के बालिग होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में सजा टिक नहीं सकती।
क्या था पूरा मामला?
पीड़िता थी बालिग़, मर्जी से किया विवाह
केस में आया बड़ा मोड़
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दस्तावेजों की जांच में पाया कि स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर में जन्मतिथि के महीने में ओवरराइटिंग है। स्कूल शिक्षक ने भी माना कि बिना दस्तावेज के, पिता के बताए अनुसार पीड़िता की उम्र दर्ज हुई। इतना ही नहीं, पिता ने भी स्वीकार किया कि बच्चों की जन्मतिथि अनुमान से लिखवाई गई थी। इस आधार पर हाईकोर्ट ने पाया कि उम्र का आधार ही विश्वसनीय नहीं रहा।
सहमति का संबंध सामने आया
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
- POCSO मामलों में उम्र निर्धारण सबसे अहम कड़ी है।
- केवल दस्तावेज नहीं, उनकी प्रामाणिकता भी जरूरी है।
- संदेह की स्थिति में आरोपी को लाभ (Benefit of Doubt) मिलता है।
