ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ग्वालियर की सिविल अदालत के एक महत्वपूर्ण आदेश को पलटते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस आशीष श्रोती की कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति वसीयत (Will) के आधार पर संपत्ति में अधिकार का दावा करता है, तो उसे मुकदमे में पक्षकार बनने का अधिकार दिया जाना चाहिए। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा खारिज की गई सब्स्टीट्यूशन (Substitution) की अर्जी को स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि न्यायिक प्रक्रिया में सभी आवश्यक पक्षों को शामिल करना अनिवार्य है, ताकि भविष्य में किसी के अधिकारों का हनन न हो। वसीयत के आधार पर दावा करने वाले व्यक्ति को मुकदमे से बाहर रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत माना गया।
क्या है पूरा मामला?
मामला ग्वालियर की सिविल कोर्ट से जुड़ा है, जिसमें वादी (Plaintiffs) ने संपत्ति पर मालिकाना हक और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग की थी। दावा किया गया कि जमीन उनके दादा ने 1944 में खरीदी थी। वहीं, प्रतिवादी (Defendants) ने 2009 के एक पुराने डिक्री के आधार पर अपना अधिकार बताया। यानी दोनों पक्ष अलग-अलग आधार पर मालिकाना हक जता रहे थे।
वसीयत और विवाद की शुरुआत
मामले में अहम मोड़ तब आया जब वादी प्रकाश चौबे का 10 जनवरी 2016 को निधन हो गया। वे अविवाहित थे और उनका कोई वारिस नहीं था। इसके बाद आलोक रघुवंशी ने कोर्ट में आवेदन देकर दावा किया कि उनके पास 24 दिसंबर 2007 की रजिस्टर्ड वसीयत है और उन्हें मृत वादी की जगह पक्षकार बनाया जाए।
ट्रायल कोर्ट ने क्यों खारिज किया आवेदन?
ग्वालियर की ट्रायल कोर्ट ने आवेदन खारिज करते हुए कहा कि दूसरे वादी के रहते मुकदमा जारी रह सकता है। वसीयत अभी साबित (prove) नहीं हुई है। इसे मानने पर नया विवाद (tri-partite dispute) खड़ा होगा, इसलिए सब्स्टीट्यूशन जरूरी नहीं है।
हाईकोर्ट में चुनौती
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी वसीयत रजिस्टर्ड है, इसलिए उन्हें पक्षकार बनाया जाना चाहिए। दूसरे वादी ने भी वसीयत पर कोई आपत्ति नहीं की। अगर उन्हें शामिल नहीं किया गया तो उनके अधिकार प्रभावित होंगे। वहीं, प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि वसीयत विवादित है। इसकी जांच अलग प्रक्रिया (Order 22 Rule 5 CPC) में होनी चाहिए। ट्रायल कोर्ट का आदेश सही है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने मामले को अलग नजरिए से देखते हुए कहा कि अगर वादी जीतते हैं, तो किसी को नुकसान नहीं होगा, लेकिन अगर प्रतिवादी जीतते हैं, तो वसीयतधारी (applicant) के अधिकार प्रभावित होंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना पक्षकार बनाए किसी व्यक्ति के अधिकार प्रभावित करना न्यायसंगत नहीं है।
वादी बनाने की अनुमति दी
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का 01.02.2017 का आदेश रद्द (set aside) किया और Order 22 Rule 3 CPC के तहत आवेदन स्वीकार (allowed) किया। साथ ही आलोक रघुवंशी को मृत वादी की जगह पक्षकार बनाने की अनुमति दी। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह आदेश केवल मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए है। इससे वसीयत की वैधता (validity) साबित नहीं मानी जाएगी। भविष्य में यदि विवाद उठता है, तो उसका निपटारा अलग से कानून के अनुसार होगा।
हाईकोर्ट का आदेश देखें MP-506-2026
