जबलपुर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने न्याय प्रक्रिया को गुमराह करने के गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए जबलपुर के शहपुरा थाना प्रभारी (टीआई) प्रवीण धुर्वे पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट संदेश दिया कि जांच में लापरवाही या गलत जानकारी देना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने लगाई फटकार, आरोपी को दी राहत
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एसएन भट्ट की एकलपीठ ने पाया कि पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के कारण आरोपी की जमानत पहले खारिज हुई थी, जबकि उसके खिलाफ कोई ठोस आपराधिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं था। कोर्ट ने टीआई को निर्देश दिए कि वे एक सप्ताह के भीतर जुर्माने की राशि मध्यप्रदेश लीगल सर्विस अथॉरिटी में जमा करें। साथ ही, आरोपी प्रदीप सेन को जमानत का लाभ भी प्रदान किया गया।
क्या है मामला?
जबलपुर जिले के बेलखेड़ा क्षेत्र के ग्राम कूड़ाकला निवासी प्रदीप सेन पर आरोप था कि उसने अपने डिजिटल सिग्नेचर का दुरुपयोग कर कई लोगों को फर्जी प्रमाण पत्र जारी किए। इस मामले में उसे 30 अक्टूबर 2025 को भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था। पहले दो बार उसकी जमानत अर्जी वापस लेने के कारण खारिज हो चुकी थी। तीसरी बार उसने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी।
आपराधिक रिकॉर्ड पर बड़ा विरोधाभास
16 मार्च को हुई सुनवाई के दौरान मामले में बड़ा ट्विस्ट आया।
सरकार का दावा: आरोपी पर एक और आपराधिक मामला दर्ज है।
बचाव पक्ष का दावा: आरोपी के खिलाफ कोई अन्य केस नहीं है।
इस विरोधाभास को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने जांच अधिकारी (टीआई) को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया।
टीआई की सफाई: “नाम समान होने से हुई गलती”
कोर्ट में पेश होकर टीआई प्रवीण धुर्वे ने स्वीकार किया कि जिस आपराधिक रिकॉर्ड का हवाला दिया गया था, वह दरअसल किसी अन्य व्यक्ति का था, जिसका नाम आरोपी से मिलता-जुलता था। यानी साफ हुआ कि आरोपी प्रदीप सेन का कोई वास्तविक आपराधिक इतिहास नहीं था। पुलिस की जानकारी गलत और भ्रामक थी।
कोर्ट की सख्ती: “ऐसी लापरवाही अस्वीकार्य”
हाईकोर्ट ने इस लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि न्यायालय को गलत जानकारी देना बेहद गंभीर मामला है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच में सटीकता और जिम्मेदारी अनिवार्य है। किसी भी निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का आदेश देखें MCRC-7429-2026
