LAW'S VERDICT

MP हाईकोर्ट ने कहा- “पति गरीब है तो क्या उसे न्याय नहीं मिलेगा?”

जबलपुर “पति गरीब है तो क्या उसे न्याय नहीं मिलेगा?”  इस अहम सवाल पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए छतरपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें गरीब पति का तलाक का मुकदमा खारिज कर दिया गया था। जस्टिस विवेक कुमार सिंह और जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की डिवीज़न बेंच ने छतरपुर की फैमिली कोर्ट के आदेश रद्द करके मामले पर सुनवाई के आदेश दिए हैं।  

शादी के 16 साल बाद माँगा तलाक 

छतरपुर में रहने वाले अमीर अली का निकाह फरीदा बानो से वर्ष 2006 में मुस्लिम रीति-रिवाज से हुआ था। वैवाहिक विवाद बढ़ने पर पति ने 16 साल बाद वर्ष 2022 में तलाक की अर्जी दाखिल की। सुनवाई के दौरान फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में ₹2000 प्रति माह अंतरिम गुजारा भत्ता तय किया और हर पेशी पर ₹300 खर्च देने का आदेश अमीर अली को दिया । बकाया राशि का 50% जमा करने के बाद ही साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी गई।

गरीबी के कारण मुकदमा हुआ ख़ारिज 

पति अमीर अली ने आर्थिक तंगी के चलते आदेश का पालन नहीं किया जा सका, जिस पर 9 मई 2025 को फैमिली कोर्ट ने तलाक याचिका खारिज कर दी। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में यह अपील दाखिल की। अमीर अली की ओर से अधिवक्ता राजेंद्र यादव ने दलीलें रखीं।

पति ने की आधी राशि देने की पेशकश 

हाईकोर्ट ने अपील दाखिल करने में हुई देरी को माफ करते हुए कहा कि  “सिर्फ आर्थिक कमजोरी के आधार पर किसी व्यक्ति को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।” कोर्ट ने यह भी माना कि अपीलकर्ता ने अब 50% राशि जमा करने की इच्छा जताई है। ऐसे में फॅमिली कोर्ट को तलाक के मुकदमें की सुनवाई मेरिट पर करना चाहिए।  

पत्नी की ओर से रखी गईं दलीलें  

पत्नी फरीदा बानो की ओर से कहा गया कि पति अमीर अली पहले से ही धारा 125 CrPC के तहत गुजारा भत्ता नहीं दे रहा। अभी भी उस पर ₹3 लाख से अधिक बकाया है। वसूली की प्रक्रिया भी जारी है। इन दलीलों पर कोर्ट ने माना कि इन आपत्तियों के चलते पति के अपील के अधिकार को रोका नहीं जा सकता।

फैमिली कोर्ट का आदेश हुआ खारिज 

मामले पर दोनों पक्षों की दलीलों पर गौर करने के बाद डिवीज़न बेंच ने फैमिली कोर्ट का 9 मई 2025 का आदेश निरस्त करके पति अमीर अली का तलाक का मुकदमा पुनः बहाल कर दिया। साथ ही दोनों पक्षों को 6 अप्रैल 2026 को फैमिली कोर्ट में पेशी पर हाजिर होने के निर्देश देकर अपील का निराकरण कर दिया। 

हाईकोर्ट का आदेश देखें    FA-1871-2025

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