LAW'S VERDICT

अंग्रेजों का बंगला नं. 5 केस: हाईकोर्ट ने 26 साल पुराना बेदखली आदेश रद्द किया

अहम फैसले में हाईकोर्ट ने कहा—बिना सबूत अवैध निर्माण साबित नहीं

जबलपुर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जबलपुर कैंट में स्थित अंग्रेजों के बंगला नं. 5 से जुड़े चर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए 26 साल पुराने बेदखली आदेश को निरस्त कर दिया। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने कहा है कि बिना ठोस साक्ष्य के किसी भी निर्माण को अवैध नहीं माना जा सकता और केवल अनुमान के आधार पर कार्रवाई कानूनन टिकाऊ नहीं है।

केप्टिनहिक्सन के बंगले का हिस्सा खरीदा था 

आईडी दवांडे ने 1000 वर्गफीट का एक पुराना मकान खरीदा था, जो अंग्रेज कैप्टिन हिक्सन के बंगला नं. 5 के परिसर में स्थित है। याचिकाकर्ता का दावा था कि उन्होंने कोई नया निर्माण या संरचनात्मक बदलाव नहीं किया, बल्कि केवल जरूरी मरम्मत कर मकान को रहने योग्य बनाया। इसके बावजूद एस्टेट ऑफिसर ने 8 अप्रैल 1999 को नोटिस जारी कर कार्रवाई शुरू की और 12 जुलाई 2000 को बेदखली का आदेश पारित कर दिया।

मृत व्यक्तियों के नाम पर चली कार्रवाई

याचिकाकर्ता की और से अधिवक्ता गिरीश श्रीवास्तव और सार्थक श्रीवास्तव की दलील थी कि पूरी कार्रवाई कैप्टिन हिक्सन व अन्य के नाम पर शुरू की गई थी, जिनका पहले ही निधन हो चुका था। इस आधार पर याचिकाकर्ता ने पूरी प्रक्रिया को शुरू से ही अवैध (void ab initio) बताया।

निचली अदालत ने भी खारिज की अपील

एस्टेट ऑफिसर के आदेश के खिलाफ दायर अपील को 10वें अपर जिला न्यायाधीश, जबलपुर ने 5 मार्च 2002 को खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में सिविल रिवीजन दायर किया।

हाईकोर्ट ने माना अवैध निर्माण का प्रमाण ही नहीं 

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कई अहम बातें कहीं। डिवीज़न बेंच ने कहा- 

- मामला Public Premises (Eviction of Unauthorised Occupants) Act, 1971 के तहत था, लेकिन निचली अदालत ने गलत प्रावधान लागू किया।

- साइट प्लान में कहीं भी स्पष्ट रूप से अवैध निर्माण का प्रमाण नहीं मिला। 

- कोई पूर्व स्वीकृत नक्शा या तुलनात्मक दस्तावेज पेश नहीं किया गया। 

- न तो मौखिक और न ही दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए

कोर्ट ने कहा कि अवैध निर्माण साबित करने की जिम्मेदारी प्रशासन की थी, जिसे वह निभाने में विफल रहा। निचली अदालत का फैसला “अनुमान और अटकलों” पर आधारित था और इस तरह के निष्कर्ष कानून में स्वीकार्य नहीं हैं। हाईकोर्ट ने एस्टेट ऑफिसर के 12 जुलाई .2000 के आदेश और 05 मार्च 2002 के दोनों आदेशों को रद्द करते हुए सिविल रिवीजन को स्वीकार कर लिया।

हाईकोर्ट का आदेश देखें    CR-624-2002

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