8 हजार जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, वकील की जनहित याचिका ख़ारिज
जबलपुर। मध्यप्रदेश में करीब 8 हजार जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इंकार कर दिया है। मंगलवार को इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कहा कि जब वकील स्वयं भी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल करते हैं, तो जूनियर डॉक्टरों के शांतिपूर्ण विरोध में अदालत दखल नहीं दे सकती।
वकील ने लगाई थी जनहित याचिका
नरसिंहपुर के अधिवक्ता अंशुल तिवारी ने इस मामले में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि राज्यभर में करीब 8 हजार जूनियर डॉक्टरों के काम बंद करने से सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं, जिससे मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
स्टाइपेंड और एरियर को लेकर है विवाद
याचिका के अनुसार मप्र जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन ने सरकार के खिलाफ हड़ताल शुरू की है। डॉक्टरों का कहना है कि 7 जून 2021 के सरकारी आदेश के अनुसार CPI (Consumer Price Index) आधारित स्टाइपेंड संशोधन 1 अप्रैल 2025 से लागू होना था, लेकिन अब तक न तो संशोधित स्टाइपेंड लागू हुआ और न ही अप्रैल 2025 से मिलने वाला एरियर दिया गया। डॉक्टरों का दावा है कि इस संबंध में सरकार और संबंधित विभागों को कई बार अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
कौन-कौन सी सेवाएं की बंद
याचिका में दावा किया गया था कि विरोध स्वरूप जूनियर डॉक्टरों ने ओपीडी सेवाएं, वार्ड ड्यूटी, लैब सेवाएं और सभी वैकल्पिक ऑपरेशन (इलेक्टिव ओटी) बंद करने का निर्णय लिया है। हालांकि आपातकालीन सेवाएं जारी रखने की बात कही गई है।
हाईकोर्ट ने किया दखल से इंकार
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता पीयूष जैन उपस्थित हुए। मामले पर गौर करने के बाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने याचिका में बताए गए तथ्यों के आधार पर हस्तक्षेप से इंकार करते हुए जनहित याचिका खारिज कर दी।
