LAW'S VERDICT

सरकारी वकील की तैयारी पर हाईकोर्ट ने उठाये सवाल, योग्यता की समीक्षा के निर्देश

मुख्य सचिव को भेजा आदेश ताकि सरकारी वकीलों की नियुक्ति और क्षमता की हो सके जांच 

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक गंभीर आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान बिना तैयारी के अदालत में पहुंचे सरकारी वकील पर कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीज़न बेंच ने कहा है कि राज्य सरकार के वकील अदालत की सहायता करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार होकर आएं। मामले को गंभीर मानते हुए कोर्ट ने आदेश की प्रति राज्य के मुख्य सचिव को भेजते हुए सरकारी वकीलों की नियुक्ति और उनकी क्षमता की समीक्षा की जा सके।

आजीवन कारावास के खिलाफ दाखिल हुई है अपील 

मामला सिंगरौली जिले के सरई थाना क्षेत्र से जुड़े एक हत्या प्रकरण का है। प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वैढन द्वारा 21 नवंबर 2017 को दिए गए फैसले के खिलाफ अपील दायर की गई थी। इस फैसले में बच्चेलाल बसोर और शोभन बसोर को धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास और धारा 323/34 के तहत एक-एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। इस फैसले के खिलाफ सजा पाए आरोपियों की ओर से यह अपील वर्ष 2017 में हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी।

एक आरोपी को मिली जमानत ,  दूसरे को नहीं 

 सुनवाई के दौरान शोभन बसोर की ओर से दायर पहली जमानत याचिका पर कोर्ट ने गौर किया कि उसका नाम मूल एफआईआर में दर्ज नहीं था और अपील के अंतिम निपटारे में समय लग सकता है। इसे देखते हुए अदालत ने उसकी शेष सजा पर रोक लगाते हुए 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों पर उसे जमानत देने का आदेश दिया। वहीं सह-आरोपी बच्चेलाल बसोर की जमानत याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि एफएसएल रिपोर्ट में उसके कब्जे से बरामद लाठी पर मानव रक्त पाए जाने की पुष्टि हुई है और प्रत्यक्षदर्शी गवाह भी उसके खिलाफ हैं, इसलिए सजा निलंबित करने का आधार नहीं बनता।

सरकारी वकील की तैयारी पर जताई नाराजगी 

सुनवाई के दौरान डिवीज़न बेंच ने यह भी पाया कि राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील कमल सिंह बघेल मामले की तैयारी किए बिना अदालत में उपस्थित हुए थे। वे अदालत द्वारा पूछे गए सवालों का जवाब देने में भी असमर्थ रहे। इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि यह गंभीर मामला है और राज्य सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि अदालत में नियुक्त अधिवक्ता योग्यता और दक्षता के आधार पर ही नियुक्त हों। कोर्ट ने आदेश की प्रति मुख्य सचिव को भेजते हुए सरकारी अधिवक्ताओं की सूची की समीक्षा करने और उनकी क्षमता का मूल्यांकन करने के निर्देश दिए हैं।

हाईकोर्ट में लंबित है नई नियुक्तियों का विवाद 

यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि महाधिवक्ता कार्यालय में सरकारी वकीलों की हुई नई नियुक्तियों के खिलाफ मप्र हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सह सचिव योगेश सोनी ने एक जनहित याचिका दाखिल की थी। वह जनहित याचिका फिलहाल लंबित है, जिसकी सुनवाई 18 मार्च को हाईकोर्ट में होना है। उस मामले में भी सरकारी वकीलों की योग्यता पर सवाल उठाये गए हैं।

हाईकोर्ट का आदेश देखें   CRA-5651-2017

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