LAW'S VERDICT

जज की आसंदी पर भ्रूण रखने वाले को हाईकोर्ट ने लगाई फटकार, कहा- दोबारा ऐसी गुस्ताखी की तो होगी कार्रवाई

2 सौ करोड़ के कथित गबन को लेकर दाखिल याचिका को बोगस बताकर हाईकोर्ट ने किया ख़ारिज  

जबलपुर। सहानुभूति पाने के इरादे से जज की आसंदी (डाइस) के सामने मृत भ्रूण रखने वाले रीवा के दयाशंकर पाण्डेय को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस हिमांशु जोशी की अदालत ने कहा है कि अदालत की कार्यवाही को भावनात्मक प्रदर्शन करने या अनावश्यक सहानुभूति प्राप्त करने का मंच नहीं बनाया जा सकता। बेंच ने याचिकाकर्ता को सख्त हिदायत देकर कहा है कि भविष्य में कोर्ट या किसी भी पुब्लिक अथॉरिटी के सामने वह तमीज से पेश आए। दोबारा इस तरह की गुस्ताखी करने पर उसके खिलाफ सख्ती से निपटा जाएगा।इस मत के साथ दयाशंकर पाण्डेय की ओर से दाखिल याचिका को बोगस बताकर कोर्ट ने खारिज कर दिया है। 

                   याचिकाकर्ता दयाशंकर पाण्डेय 

कंपनी पर लगाए थे ₹200 करोड़ गबन के आरोप

याचिकाकर्ता ने स्वयं पेश होकर अदालत को बताया कि उसने एक बड़ी कार निर्माण कंपनी में ₹200 करोड़ से अधिक के गबन और चोरी का खुलासा किया है। उसका आरोप था कि इस खुलासे के बाद उसे और उसके परिवार को कई बार धमकियां और हमले झेलने पड़े। उसने यह भी दावा किया कि हाल ही में एक कार से हमला हुआ, जिससे उसकी पत्नी का गर्भपात हो गया और पहले हुए एक आगजनी हमले में उसकी बेटी गंभीर रूप से घायल होकर दिव्यांग हो गई। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि पुलिस को निष्पक्ष जांच का आदेश दिया जाए, कंपनी से ₹200 करोड़ से अधिक की वसूली कराई जाए और उसकी बेटी के इलाज और अन्य नुकसान के लिए ₹82 लाख मुआवजा दिलाया जाए।

कोर्ट ने कहा—आरोपों का कोई सबूत नहीं

राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता विवेक शर्मा, शासकीय अधिवक्ता प्रियंका शर्मा और अन्य अनावेदकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा व अधिवक्ता लावण्या वर्मा ने याचिका का विरोध किया। उनका कहना था  कि याचिकाकर्ता द्वारा याचिका में लगाए गए आरोप काल्पनिक और अस्पष्ट हैं तथा इनके समर्थन में कोई दस्तावेज पेश नहीं किए गए हैं। हाईकोर्ट ने भी पाया कि याचिकाकर्ता ने पुलिस में दी गई शिकायतों की कोई प्रति दाखिल नहीं की और गबन या हमले से संबंधित कोई प्रमाण नहीं दिया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण अधिकार क्षेत्र का उपयोग केवल ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता पहले भी इसी घटना से संबंधित दो याचिकाएं दाखिल कर चुका है, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया था। अदालत ने कहा कि बार-बार एक ही मामले में याचिका दाखिल करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। 

कोर्ट में भ्रूण रखने पर सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि 9 मार्च को हुई सुनवाई पर याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने भ्रूण रखकर कोर्ट से सहानुभूति प्राप्त करने की कोशिश की गई। अदालत ने इसे अत्यंत आपत्तिजनक और अदालत की गरिमा के विपरीत बताया। कोर्ट ने कहा कि मानव अवशेषों को बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम, 2016 के अनुसार ही संभाला जाना चाहिए और इस तरह कोर्ट में लाना कानून के खिलाफ है।

याचिका की खारिज और दी चेतावनी

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका बिना तथ्यों और साक्ष्यों के दायर की गई है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता पुलिस की कार्रवाई से असंतुष्ट है तो वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175(3) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष जा सकता है। साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को चेतावनी दी कि भविष्य में अदालत की गरिमा भंग करने वाली ऐसी हरकत दोहराई गई तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

हाईकोर्ट का आदेश देखें  WP-6020-2026


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