अनुकम्पा नियुक्ति के मामले पर इंदौर हाईकोर्ट का फैसला, 60 दिनों में पुनर्विचार के निर्देश
इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अनुकम्पा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा राहत भरा आदेश पारित किया है। जस्टिस जेके पिल्लई की कोर्ट ने कहा है कि मृत कर्मचारी के परिवार को अनुकम्पा नियुक्ति का लाभ कभी मिला ही नहीं था, ऐसे में उसकी बेटी के आवेदन को खारिज करना कानूनन गलत और मनमाना है। हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग द्वारा जारी 30 अक्टूबर 2023 के आदेश को निरस्त करके 60 दिनों के भीतर नए सिरे से आदेश पारित करने कहा है।
यह याचिका मृतक कर्मचारी की पुत्री प्रियंका पांडेय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई थी। याचिका में राजस्व निरीक्षक पद पर पदस्थ स्व. सीताराम पांडेय की मृत्यु के बाद अनुकम्पा नियुक्ति से वंचित किए जाने को चुनौती दी गई थी। स्व. पांडेय का निधन 10 दिसंबर 2010 को सेवा काल में हुआ था। उनके परिवार में पत्नी, एक पुत्र, एक अविवाहित पुत्री एवं एक विवाहित पुत्री शामिल हैं।
पहले भाई ने दिया था आवेदन
मृतक के पुत्र संजीव पांडेय ने वर्ष 2011 में अनुकम्पा नियुक्ति हेतु आवेदन किया था। प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद उन्हें पटवारी प्रशिक्षण के लिए चयनित भी किया गया और उन्होंने प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया। हालांकि पुलिस सत्यापन में जुआ अधिनियम के तहत वर्ष 2008-09 के दो पुराने मामले सामने आने के कारण उनका चयन 08 जनवरी 2015 को निरस्त कर दिया गया।
माँ ने बेटी के नाम का दिया प्रस्ताव
इसके बाद मृतक की पत्नी ने वर्ष 2016 में अपनी बेटी (याचिकाकर्ता) के लिए अनुकम्पा नियुक्ति का आवेदन प्रस्तुत किया। विभाग द्वारा बार-बार आश्वासन दिया गया कि पहले पुत्र के मामले के अंतिम निर्णय के बाद इस आवेदन पर विचार किया जाएगा। इसी आश्वासन के आधार पर पहले पुत्र ने अपनी याचिका वापस ले ली थी। इसके बावजूद विभाग ने 30 अक्टूबर 2023 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि सात वर्ष की समय-सीमा समाप्त होने के कारण अब आवेदन पर विचार नहीं किया जा सकता।
परिवार को लाभ कभी मिला ही नहीं: कोर्ट
हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि अनुकम्पा नियुक्ति का लाभ परिवार को कभी मिला ही नहीं, केवल चयन प्रक्रिया निरस्त हुई थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि नियुक्ति प्रदान करने और नियुक्ति निरस्त करने के बीच स्पष्ट कानूनी अंतर है, जिसे विभाग समझने में विफल रहा। अदालत ने आदेश दिया है कि विभाग 60 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के आवेदन पर नीति के अनुसार पुनः विचार करे।
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