POCSO केस में “पूरे जीवन की उम्रकैद” को अवैध ठहराकर HC ने कठोर आजीवन कारावास में बदला
क्या था पूरा मामला
12 अप्रैल 2012 को 4 साल की बच्ची लापता हुई थी। बाद में वह गंभीर हालत में मिली, जिसे अस्पताल ले जाया गया। मेडिकल जांच में दुष्कर्म की पुष्टि हुई। जांच के दौरान गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट, टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड और DNA जांच के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार किया गया।
2013 की सजा को दी गई थी चुनौती
आरोपी शिवा ने सत्र न्यायालय, इंदौर द्वारा 11 जुलाई 2013 को पारित फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे IPC की धाराओं 363 और 366 के तहत 5 व 7 वर्ष के कठोर कारावास तथा POCSO एक्ट व IPC की धारा 376(2)(i)(m) के तहत पूरे शेष जीवन के लिए उम्रकैद की सजा दी गई थी।
दूसरी जमानत अर्जी पर सुनवाई, लेकिन फैसला सजा पर
यह आपराधिक अपील आरोपी शिवा द्वारा दायर दूसरी जमानत अर्जी के लिए सूचीबद्ध हुई थी। हालांकि, डिवीज़न बेंच ने जमानत पर विचार न करते हुए सजा की मात्रा (Quantum of Punishment) पर अंतिम सुनवाई की। शासन की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल सोनल गुप्ता ने पक्ष रखा।
हाईकोर्ट का अहम कानूनी आधार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध वर्ष 2012 का है। “शेष जीवन की उम्रकैद” का प्रावधान 2019 के संशोधन से जोड़ा गया। संशोधित कानून को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता। इन आधारों पर कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई पूरे जीवन की उम्रकैद कानूनन सही नहीं है। बेंच ने IPC और POCSO एक्ट के तहत आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखकर “शेष जीवन की उम्रकैद” रद्द करके उसे आजीवन कठोर कारावास में तब्दील किया।
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