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BNSS की धारा 213 पर अहम फैसला, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश किया रद्द
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम आपराधिक पुनरीक्षण में ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें चार्ज फ्रेम होने और ट्रायल शुरू होने के बाद नए व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया था। जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की अदालत ने कहा है कि चार्ज तय हो जाने के बाद BNSS, 2023 की धारा 213 (पूर्व में धारा 193 CrPC) के तहत किसी नए व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया जा सकता। इस अवस्था में ट्रायल कोर्ट केवल धारा 319 CrPC के तहत ही कार्रवाई कर सकता है, वह भी साक्ष्य रिकॉर्ड होने के बाद।
क्या है पूरा मामला
मामला छतरपुर जिले के लवकुश नगर थाने में दर्ज मामले से जुड़ा है, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने दिनांक 24 मई 2025 को शिकायतकर्ता की अर्जी स्वीकार करते हुए गणेश प्रसाद गर्ग और बबलू मिश्रा को आरोपी बना दिया था, जबकि पुलिस जांच में दोनों को निर्दोष पाया गया था। दोनों आरोपी न तो घटनास्थल पर थे और न ही चार्जशीट में नाम थे। ट्रायल कोर्ट पहले ही 28 जनवरी 2025 को चार्ज फ्रेम कर चुका था। इसके बावजूद शिकायतकर्ता ने 7 मार्च 2025 को BNSS की धारा 213 के तहत आवेदन दायर किया, जिसे ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर गणेश प्रसाद गर्ग और बबलू मिश्रा को आरोपी बनाया था।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा- “जब चार्ज फ्रेम हो चुके हों और मामला साक्ष्य के चरण में हो, तब धारा 213 BNSS के तहत नए आरोपी जोड़ना कानूनन गलत है।” हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Omi @ Omkar Rathore का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यदि चार्जशीट में किसी व्यक्ति का नाम नहीं है और चार्ज फ्रेम हो चुके हैं तो ट्रायल कोर्ट केवल धारा 319 CrPC के तहत ही आरोपी के रूप में नए नाम जोड़ सकता है। वह भी गवाहों के बयान और क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन के बाद।
राजनीतिक रंजिश का भी आरोप
आवेदकों की ओर से अधिवक्ता मनोज कुमार मिश्रा की दलील थी कि मामला सरपंच चुनाव की राजनीतिक रंजिश से प्रेरित है। आवेदक बबलू मिश्रा की पत्नी गांव की निर्वाचित सरपंच हैं। शिकायतकर्ता पारिवारिक रिश्तेदार है और राजनितिक रंजिश के कारण दुर्भावना से उनके मुवक्किलों के नाम जोड़ने का प्रयास किया गया। हाईकोर्ट ने माना कि केवल शिकायत के आधार पर, बिना साक्ष्य, किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
गवाही में सबूत आएं, तब जोड़ा जाए नाम
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि पहले गवाहों के बयान रिकॉर्ड हों। जिरह पूरी हो। उसके बाद यदि पर्याप्त साक्ष्य सामने आएं, तभी धारा 319 CrPC के तहत नए आरोपी जोड़े जा सकते हैं।