जांच रिपोर्ट से असहमति पर कारण बताओ नोटिस और सुनवाई अनिवार्य: ग्वालियर बेंच
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि अनुशासनिक प्राधिकारी जांच अधिकारी (Inquiry Officer) की रिपोर्ट से असहमत है, तो वह बिना कर्मचारी को सुनवाई का अवसर दिए दंड नहीं दे सकता। ऐसा करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।
यह निर्णय न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने रिट अपील क्रमांक 530/2025 – महेंद्र सिंह चौहान बनाम भारत संघ एवं अन्य में पारित किया।
मामला क्या था?
अपीलकर्ता महेंद्र सिंह चौहान, रेलवे प्रोटेक्शन स्पेशल फोर्स (RPSF) में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2016 में एक दिन के कैजुअल लीव के दौरान उन्हें दतिया पुलिस ने एक आपराधिक मामले में हिरासत में लिया, जिसके कारण वे समय पर ड्यूटी जॉइन नहीं कर सके।
इसके बाद विभागीय जांच शुरू हुई।
जांच अधिकारी ने 24 फरवरी 2019 को सभी आरोप अप्रमाणित मानते हुए अपीलकर्ता को दोषमुक्त कर दिया,
लेकिन इसके बावजूद अनुशासनिक प्राधिकारी ने बिना किसी नोटिस या सुनवाई के 29 मार्च 2019 को सेवा से बर्खास्त कर दिया।
विभागीय अपील और पुनरीक्षण असफल रहने के बाद कर्मचारी ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां सिंगल बेंच ने याचिका खारिज कर दी। इसके विरुद्ध यह रिट अपील दायर की गई।
हाईकोर्ट का अवलोकन
डिवीजन बेंच ने कहा कि—
“जब जांच अधिकारी ने कर्मचारी को दोषमुक्त किया हो और अनुशासनिक प्राधिकारी उस निष्कर्ष से असहमत हो, तो उसके लिए यह अनिवार्य है कि वह अपने अस्थायी कारणों को रिकॉर्ड करे और कर्मचारी को सुनवाई का अवसर प्रदान करे।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि RPF Rules, 1987 का नियम 154.5 अनुशासनिक प्राधिकारी को असहमति का अधिकार जरूर देता है, लेकिन यह सुनवाई के अधिकार को समाप्त नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के निम्नलिखित मामलों पर भरोसा किया—
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Punjab National Bank v. Kunj Behari Misra (1998)
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Yoginath D. Bagde v. State of Maharashtra
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Lav Nigam v. Chairman & MD, ITI Ltd.
इन सभी मामलों में यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि जांच रिपोर्ट से असहमति की स्थिति में सुनवाई देना अनिवार्य है।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने सिंगल बेंच का आदेश रद्द करके महेंद्र सिंह चौहान का बर्खास्तगी आदेश निरस्त किया और मामला अनुशासनिक प्राधिकारी को वापस भेज कर उसको सुनवाई का अवसर देकर 3 माह में प्रक्रिया पूरी करने का भी निर्देश दिया।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला सेवा कानून (Service Law) के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है और उन मामलों के लिए मार्गदर्शक है, जहां—
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जांच अधिकारी ने क्लीन चिट दी हो
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लेकिन अनुशासनिक प्राधिकारी ने बिना सुनवाई सजा दे दी हो
यह निर्णय फेयर प्रोसीजर और कर्मचारी अधिकारों को मजबूती देता है।
