दस्तावेजों की कमी पर कोर्ट सख्त, कहा– दलील और रिकॉर्ड में तालमेल नहीं
जबलपुर। मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में प्रस्तावित अडानी थर्मल पावर प्लांट को लेकर दायर जनहित याचिका को हाईकोर्ट ने वापस लेने के कारण खारिज कर दिया है। मंगलवार को हुई सुनवाई में संजीव सचदेवा और विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने कहा कि याचिका में लगाए गए दस्तावेज आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिका में जो मुद्दे उठाए गए हैं, उनसे जुड़े दस्तावेज अलग हैं और बहस के दौरान प्रस्तुत दलीलें कुछ और ही दिशा में जा रही हैं। ऐसे में अदालत का हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता।
आदिवासी भूमि और ग्राम सभा की अनुमति का मुद्दा
कोतमा के पूर्व विधायक सुनील सराफ द्वारा दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया था कि कोतमा क्षेत्र में आदिवासियों की जमीन पर ग्राम सभा की अनुमति के बिना थर्मल पावर प्लांट स्थापित किया जा रहा है, जो संविधान और PESA कानून के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया कि कंपनी ने केवई नदी पर कथित रूप से गुपचुप बांध बना दिया, जिससे आसपास के कई गांवों में जल संकट पैदा हो सकता है।
वेलस्पन से अडानी तक जमीन का विवाद
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया था कि लगभग 15 वर्ष पहले ग्राम पंचायत उमरदा, मझौली और छटई की आदिवासी भूमि वेलस्पन कंपनी को दी गई थी, लेकिन निर्धारित अवधि में कोई उद्योग स्थापित नहीं हुआ। नियमों के अनुसार ऐसी जमीन सरकार को वापस होनी चाहिए थी, लेकिन बाद में वही जमीन अडानी समूह के प्रोजेक्ट के लिए उपयोग में लाई गई—ऐसा आरोप लगाया गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन सभी आरोपों के समर्थन में ठोस और प्रासंगिक दस्तावेजों की कमी को देखते हुए जनहित याचिका को खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद अडानी थर्मल पावर प्रोजेक्ट को बड़ी कानूनी राहत मिली है।
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