नई दिल्ली। हालिया न्यायिक टिप्पणियाँ यह साफ कर रही हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है। सोशल मीडिया, पत्रकारिता और सार्वजनिक भाषण से जुड़े मामलों में अदालतों ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है।
कोर्ट ने कहा कि आलोचना लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन घृणा, अफ़वाह और हिंसा भड़काने वाली भाषा संविधान के संरक्षण में नहीं आती।
इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में “फ्री स्पीच” और “हेट स्पीच” की रेखा और स्पष्ट की जाएगी।
Tags
Judgment-Analysis
