जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने युवाओं में बढ़ती ईर्ष्या (सिबलिंग राइवलरी) से उपज रही मानसिक विकृतियों को गंभीर सामाजिक खतरा बताते हुए राज्य सरकार को ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि समय रहते इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो यह समस्या विकराल रूप ले सकती है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र बिसेन की डिवीजन बेंच ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे 90 दिनों के भीतर एक व्यापक मानसिक स्वास्थ्य नीति तैयार करें। इस नीति में विशेष रूप से स्कूल और कॉलेज स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नियुक्ति, जिला अस्पतालों में मनोचिकित्सक एवं काउंसलर की उपलब्धता और युवाओं में ईर्ष्या की प्रवृत्तियों पर रोक के उपायों को शामिल किया जाए। साथ ही कोर्ट ने 90 दिनों के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) प्रस्तुत करने को भी कहा है। जस्टिस विवेक अग्रवाल की अध्यक्षता वाली डिवीज़न बेंच का यह फैसला न केवल एक आपराधिक मामले में जमानत अस्वीकार करने तक सीमित है, बल्कि राज्य की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक पहल भी माना जा रहा है।
इस मामले पर दिए निर्देश
यह आदेश नरसिंहपुर जिले के सांईंखेड़ा निवासी खुश्बू उर्फ दिशा अवस्थी की अपील पर सुनवाई के दौरान दिया गया। खुश्बू पर आरोप है कि 22 फरवरी 2023 को खुश्बू ने अपने सहयोगी राहुल सिंह के साथ मिलकर अपनी बहन शिखा की हत्या की। अभियोजन के अनुसार हत्या की वजह ईर्ष्या थी, हालांकि ईर्ष्या का कारण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया। 18 दिसंबर 2024 को अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने दोनों आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस फैसले को चुनौती देते हुए खुश्बू ने हाईकोर्ट में जमानत की याचिका लगाई थी।
जमानत से इंकार, अर्जी वापस
राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता बीके उपाध्याय ने दलील दी कि हत्या ईर्ष्या के चलते की गई थी। मेमोरेन्डम के आधार पर हत्या में प्रयुक्त चाकू और पानी की टंकी का ढक्कन बरामद हुआ तथा सह-आरोपी की शर्ट पर मृतका के खून के निशान मिले। साक्ष्यों को पर्याप्त मानते हुए डिवीजन बेंच ने जमानत याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
बेंच ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि युवाओं में बढ़ती मानसिक अस्थिरता और ईर्ष्या से जुड़ी विकृत मानसिकता का संकेत है। समाज में इस प्रवृत्ति को समय रहते नियंत्रित करना आवश्यक है, अन्यथा इसके दुष्परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह आदेश?
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पहली बार किसी अदालत ने सिबलिंग ईर्ष्या को सामाजिक-मानसिक स्वास्थ्य मुद्दे के रूप में रेखांकित किया।
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राज्य सरकार को ठोस नीति निर्माण के लिए समयबद्ध निर्देश।
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स्कूल-कॉलेज स्तर पर काउंसलिंग व्यवस्था मजबूत करने पर जोर।
हाईकोर्ट का आदेश देखें CRA-2990-2025
