LAW'S VERDICT

ऊंचाई में कमी के आधार पर बर्खास्तगी को हाईकोर्ट ने सही ठहराया, बर्खास्त आरक्षक की याचिका खारिज

ग्वालियरऊंचाई .67 से. मी.  कम होने के आधार पर एक कर्मचारी की बर्खास्ती को मप्र हाईकोर्ट ने सही ठहराया है। जस्टिस आनंद सिंह बेहरावत की अदालत ने 18वीं बटालियन शिवपुरी के बर्खास्त आरक्षक की याचिका का खारिज कर कहा है कि कोर्ट निर्णय के सही या गलत की नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच करता है। अदालत ने माना कि यह मामला विशेषज्ञ राय से जुड़ा है और इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।अदालत ने विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

अक्टूबर 2013 में हुई थी नियुक्ति 

शिवपुरी में रहने वाले नरेंद्र सिंह यादव की भर्ती 18वीं बटालियन में  21 अक्टूबर 2013 को आरक्षक (GD) के पद पर हुई थी और उसने छह वर्षों तक सेवाएं दीं। वर्ष 2017 में उसे दोबारा मेडिकल बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत होने के निर्देश दिए गए। जिला मेडिकल बोर्ड ने उसकी ऊंचाई 168 सेमी पाई। संभागीय मेडिकल बोर्ड ने 167.5 सेमी और राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड ने 167 सेमी दर्ज की।

.67 से. मी. कम थी याचिकाकर्ता की ऊंचाई 

सरकारी प्रावधान (GOP) के अनुसार आवश्यक न्यूनतम ऊंचाई 167.64 सेमी थी। राज्य स्तरीय बोर्ड द्वारा 167 सेमी मापे जाने के आधार पर उसे अयोग्य घोषित कर दिया गया और 23.04.2019 को सेवा समाप्ति का आदेश जारी कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि नियुक्ति के समय सभी योग्यताएं विधिवत सत्यापित की गई थीं। बिना कारण बताओ नोटिस और बिना सुनवाई का अवसर दिए सेवा समाप्त की गई। Madhya Pradesh Special Armed Forces Rules, 1973 के नियम 22 के तहत वह नियुक्ति के समय योग्य था। ऐसे में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।

दोबारा हुआ था परीक्षण 

राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता प्रभात पटेरिया की दलील थी कि नियम 22 के अनुसार आरक्षक पद के लिए न्यूनतम ऊंचाई 5 फीट 6 इंच (168 सेमी) अनिवार्य है। शिकायत मिलने पर दोबारा परीक्षण में संभागीय मेडिकल बोर्ड ने ऊंचाई 165.50 सेमी पाई। राज्य मेडिकल बोर्ड ने 167 सेमी दर्ज की। इस प्रकार अभ्यर्थी न्यूनतम मापदंड पूरा नहीं करता था, इसलिए नियुक्ति निरस्त की गई।

न्यायिक समीक्षा की सीमित गुंजाइश

हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में दुर्भावना का कोई आरोप नहीं है। विशेषज्ञ समिति/मेडिकल बोर्ड के निर्णय में न्यायिक समीक्षा की सीमित गुंजाइश होती है। न्यायालय निर्णय की सही या गलत नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच करता है। विशेषज्ञों के निष्कर्षों के स्थान पर कोर्ट अपने निष्कर्ष को नहीं रख सकता। 

हाईकोर्ट का आदेश देखें   WP. No. 15760 of 2019

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