LAW'S VERDICT

“एक डॉक्टर के कारण सैकड़ों-हजारों का क्यों कराएं सत्यापन?”

 फर्जी डॉक्टरों के मुद्दे पर मप्र हाईकोर्ट का कड़ा रुख

जबलपुर। दमोह जिले के कथित फर्जी कॉर्डियोलॉजिस्ट के मामले को आधार बनाकर प्रदेशभर के डॉक्टरों की डिग्री सत्यापन की मांग पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सोमवार को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस संजिव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कहा कि क्या याचिकाकर्ता यह चाहते हैं कि मात्र एक कथित डॉक्टर के कारण वर्षों से प्रैक्टिस कर रहे सैकड़ों-हजारों डॉक्टर अपनी डिग्रियों का सत्यापन कराएं? अदालत ने इसे डॉक्टरों के लिए प्रताड़ना जैसा कदम बताया। बेंच के इस सख्त रुख के बाद याचिकाकर्ता की ओर से अन्य कथित फर्जी डॉक्टरों का ब्यौरा पेश करने के लिए समय मांगा गया। अदालत ने दो सप्ताह की मोहलत देते हुए अगली सुनवाई 10 मार्च को तय की है।

चीफ जस्टिस की दो टूक ...

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सचदेवा ने कहा- याचिकाकर्ता ने जो राहत चाही है, उसकी स्क्रूटिनी कैसे होगी? माना कि एक डॉक्टर की डिग्री फर्जी थी, तो क्या 40-50 सालों से जो डॉक्टर प्रैक्टिस कर रहे, उनको अब अपनी डिग्रियों की जांच कराना होगी। आप खुद सोचिये, उन डॉक्टरों को कितनी प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा। मात्र एक उदाहरण के कारण सैकड़ों-हजारों को परेशान करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। 

जबलपुर के वकील ने लगाईं है जनहित याचिका 

याचिका जबलपुर के बाबाटोला निवासी अधिवक्ता तेज कुमार भगत द्वारा दायर की गई है। इसमें दमोह के एक मिशन अस्पताल में स्वयं को कार्डियोलॉजिस्ट बताकर सेवाएं देने वाले नरेंद्र जॉन केम (कैम) का उल्लेख किया गया है। आरोप है कि उन्होंने 20 से अधिक मरीजों के ऑपरेशन किए, जिनमें से 7 की मृत्यु हो गई। याचिका में बताया गया कि संबंधित डॉक्टर की नियुक्ति अस्पताल ने एक आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से की थी। आरोप है कि न तो एजेंसी और न ही अस्पताल प्रबंधन ने उनकी शैक्षणिक डिग्री और मेडिकल काउंसिल से जारी पंजीयन प्रमाणपत्र का सत्यापन किया।

राज्यव्यापी स्क्रूटिनी की मांग

याचिका में दावा किया गया है कि प्रदेश के कई निजी अस्पतालों में बिना वैध लाइसेंस और पंजीयन के डॉक्टर कार्यरत हैं। ऐसे में एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित कर राज्यभर के सभी मेडिकल प्रैक्टिशनरों की शैक्षणिक योग्यता और रजिस्ट्रेशन का सत्यापन कराने की मांग की गई है। हालांकि प्रारंभिक सुनवाई में हाईकोर्ट ने कहा कि केवल एक व्यक्ति के मामले के आधार पर सभी डॉक्टरों की योग्यता पर सवाल खड़ा करना उचित नहीं है। अदालत ने संकेत दिया कि ठोस तथ्यों के बिना व्यापक आदेश जारी नहीं किए जा सकते। अब नजर 10 मार्च की सुनवाई पर है, जब याचिकाकर्ता कथित अन्य फर्जी डॉक्टरों का ब्यौरा कोर्ट के समक्ष पेश करेंगे।

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