Supreme Court Landmark Judgment | शाह बानो बनाम मोहम्मद अहमद खान (1985)
Shah Bano Case (1985) भारतीय न्यायपालिका के सबसे चर्चित और ऐतिहासिक फैसलों में से एक है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। यह फैसला महिला अधिकार, समानता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़ा मील का पत्थर माना जाता है।
क्या था पूरा मामला? (Facts of the Case)
शाह बानो बेगम, मध्यप्रदेश के इंदौर की निवासी थीं। उनके पति मोहम्मद अहमद खान एक संपन्न वकील थे।
करीब 43 साल के विवाह के बाद पति ने शाह बानो को तलाक (तीन तलाक) दे दिया और मेहर राशि देकर आगे किसी प्रकार के भरण-पोषण से इनकार कर दिया।
शाह बानो ने इसके बाद:
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CrPC की धारा 125 के तहत
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फैमिली कोर्ट में गुजारा भत्ता की मांग की
पति की दलील (Husband’s Argument)
पति ने अदालत में तर्क दिया कि:
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मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार
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इद्दत अवधि के बाद पति की कोई जिम्मेदारी नहीं रहती
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इसलिए धारा 125 लागू नहीं होती
मामले में उठे मुख्य कानूनी प्रश्न
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क्या मुस्लिम महिला CrPC की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण मांग सकती है?
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क्या पर्सनल लॉ, सामान्य कानून (CrPC) से ऊपर है?
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क्या तलाकशुदा महिला का भरण-पोषण मानवाधिकार का विषय है?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला (Judgment)
संविधान पीठ ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा:
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धारा 125 धर्मनिरपेक्ष कानून है, यह सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होती है
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तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी गुजारा भत्ता पाने की हकदार है
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पति की जिम्मेदारी केवल इद्दत तक सीमित नहीं हो सकती
कोर्ट ने पति को ₹179.20 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।
समान नागरिक संहिता (UCC) पर टिप्पणी
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 44 (Uniform Civil Code) का उल्लेख करते हुए कहा कि:
“समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगी।”
यह टिप्पणी आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस का कारण बनी।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
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फैसले के बाद देशभर में तीव्र राजनीतिक और धार्मिक प्रतिक्रिया हुई
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वर्ष 1986 में संसद ने
Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986
पारित किया, जिससे शाह बानो फैसले के प्रभाव को सीमित किया गया
भारतीय कानून में महत्व (Significance)
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महिला अधिकारों की दिशा में मील का पत्थर
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धर्म और कानून के बीच संतुलन का उदाहरण
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आज भी भरण-पोषण मामलों में संदर्भित
निष्कर्ष (Conclusion)
Shah Bano Case ने यह सिद्ध किया कि
👉 न्याय, समानता और मानव गरिमा धर्म से ऊपर हैं।
यह फैसला भारतीय संवैधानिक मूल्यों और महिला सशक्तिकरण की मजबूत आधारशिला है।
