नई दिल्ली। भारतीय न्यायिक इतिहास में यदि किसी एक फैसले को “संविधान का सुरक्षा कवच” कहा जाए, तो वह केशवानंद भारती मामला है। 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक बहुमत से यह सिद्धांत स्थापित किया कि संसद को संविधान संशोधन की शक्ति तो है, लेकिन वह संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) को समाप्त नहीं कर सकती।
इस फैसले से पहले यह बहस तेज़ थी कि क्या संसद बहुमत के बल पर संविधान को पूरी तरह बदल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार संविधान की आत्मा हैं।
यह निर्णय आज भी हर बड़े संवैधानिक विवाद की नींव बना हुआ है और सत्ता की असीमित शक्ति पर न्यायपालिका की सबसे मजबूत रोक माना जाता है।
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