LAW'S VERDICT

6 दशक पुराने विवाद में इंदौर हाईकोर्ट ने भगवान श्रीराम को मंदिर और सम्पत्तियों का वास्तविक स्वामी माना

इंदौर हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला बदलकर पूजा-अर्चना का अधिकार पुजारी रतनदास को दिया 

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर। 

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने उज्जैन के खाचरौद में स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर और उससे जुड़ी चल-अचल संपत्तियों को लेकर करीब छह दशक पुराने सिविल विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस विनय सराफ की सिंगल बेंच ने जिला न्यायालय, उज्जैन के उस पुराने निर्णय को पलट दिया, जिसमें मूल वाद खारिज कर दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि श्रीराम मंदिर की चल और अचल संपत्तियों के वास्तविक एवं पूर्ण स्वामी स्वयं भगवान श्रीराम (देवता) हैं। वहीं, अदालत ने वादी रतनदास को मंदिर का विधिवत नियुक्त पुजारी मानते हुए उनके पूजा-पाठ, सेवा और अर्चना के अधिकारों को सुरक्षित रखा है। हाईकोर्ट ने साथ ही महेश्वरी समाज के श्रद्धालुओं को मंदिर में आने-जाने से रोकने के लिए किसी प्रकार की स्थायी निषेधाज्ञा (Perpetual Injunction) जारी करने से इनकार कर दिया।

क्या है श्रीराम मंदिर का पूरा विवाद?

यह मामला मूल रूप से 24 दिसंबर 1954 को वादी रतनदास पुत्र मुरलीदास बैरागी (अब स्वर्गीय) द्वारा दायर सिविल सूट से संबंधित है। हाईकोर्ट में या मामला वर्ष 1968 में निचली अदालत के उस फैसले के खिलाफ दाखिल हुआ था, जिसमे इस विवाद को लेकर दाखिल वाद 28 जून 1968 को खारिज किये जाने को चुनौती दी गई थी। मामले पर चली लंबी  सुनवाई के बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस विनय सराफ ने अपना विस्तृत फैसला सुनाया।

संवत 1584 में मंदिर स्थापना का दावा

वादी पक्ष के अनुसार, खाचरौद के राममोहल्ला स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर की स्थापना संवत 1584 में बाबा मायारामदास जी ने की थी। वादी रतनदास के अनुसार उनके पूर्वज महंत गोपीदासजी और पिता मुरलीदासजी परंपरागत रूप से मंदिर में पुजारी एवं प्रबंधक के रूप में सेवा करते रहे। इसी पारंपरिक व्यवस्था के आधार पर रतनदास ने भी मंदिर में अपने पूजा-अर्चना के अधिकार का दावा किया था।

1930 में मंदिर औकाफ विभाग के अधीन किया गया

मामले में सामने आए तथ्यों के अनुसार वर्ष 1930 में मंदिर के प्रबंधन को लेकर उत्पन्न परिस्थितियों के बीच महंत मुरलीदास ने मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों को बेहतर सुरक्षा एवं प्रबंधन के उद्देश्य से तत्कालीन औकाफ (Auqaf) विभाग के अधीन सौंप दिया था। बाद में मंदिर के प्रबंधन और पुजारी की नियुक्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जो अंततः न्यायालय तक पहुंचा।

महेश्वरी समाज ने वसीयत के आधार पर जताया प्रबंधन का दावा

मामले में महेश्वरी समाज के प्रतिनिधियों की ओर से भी अपना पक्ष रखा गया। समाज की ओर से यह दावा किया गया कि पूर्व महंत गोपीदासजी ने समाज के पंचों के पक्ष में एक वसीयत (Will) निष्पादित की थी। समाज के प्रतिनिधियों का पक्ष था कि उक्त वसीयत के आधार पर समाज के लोगों को मंदिर के प्रबंधन में भूमिका प्राप्त थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और मंदिर की परंपरा को देखते हुए वादी रतनदास के रमनंद संप्रदाय की परंपरा और 'भेक' (Bhekh) संस्कार से जुड़े होने को महत्व दिया और उन्हें वैध पुजारी माना।

हाईकोर्ट ने माना- भगवान श्रीराम ही संपत्ति के स्वामी

मामले में हाईकोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण घोषणा मंदिर की संपत्ति के स्वामित्व को लेकर रही। अदालत ने स्पष्ट किया कि राममोहल्ला स्थित श्रीराम मंदिर की समस्त चल और अचल संपत्तियों के एकमात्र एवं पूर्ण स्वामी भगवान श्रीराम, अर्थात देवता हैं। इस प्रकार मंदिर की संपत्ति पर किसी व्यक्ति, समाज या अन्य संस्था के व्यक्तिगत स्वामित्व के दावे को देवता के स्वामित्व से अलग माना गया।

रतनदास को वैध पुजारी मानते हुए अधिकार सुरक्षित

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि तत्कालीन औकाफ विभाग को मंदिर के पुजारी की नियुक्ति का अधिकार प्राप्त था। अदालत के अनुसार, रतनदास को 30 अप्रैल 1948 को विधिवत रूप से मंदिर का पुजारी नियुक्त किया गया था। इस आधार पर अदालत ने उन्हें मंदिर में पूजा-पाठ, सेवा और अर्चना करने का कानूनी अधिकार प्रदान किया।

महेश्वरी समाज के श्रद्धालुओं को मंदिर आने से नहीं रोका जा सकता

मंदिर में प्रवेश और श्रद्धालुओं के अधिकार को लेकर भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने माना कि महेश्वरी समाज के सदस्य मंदिर के सच्चे एवं समर्पित भक्त हैं और उन्होंने मंदिर के विकास तथा रखरखाव में भी योगदान दिया है। ऐसी स्थिति में समाज के सदस्यों को मंदिर में आने-जाने से रोकने के लिए Perpetual Injunction (स्थायी निषेधाज्ञा) जारी करना उचित नहीं होगा। इसलिए हाईकोर्ट ने महेश्वरी समाज के श्रद्धालुओं के मंदिर में प्रवेश पर स्थायी रोक लगाने की मांग को स्वीकार नहीं किया।

मंदिर का प्रशासनिक प्रबंधन राज्य के पास

हाईकोर्ट ने मंदिर की वर्तमान प्रशासनिक स्थिति को लेकर भी स्पष्ट किया कि मंदिर वर्तमान में राजस्व विभाग के अंतर्गत राज्य प्रशासन द्वारा प्रबंधित किया जा रहा है। इस प्रकार अदालत ने एक ओर देवता को संपत्तियों का स्वामी माना, वहीं दूसरी ओर वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था को भी स्पष्ट किया।

High Court का फैसला: अपील आंशिक रूप से मंजूर

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मामले में दायर First Appeal को Partly Allowed (आंशिक रूप से मंजूर) किया। फैसले में अदालत ने मंदिर की संपत्तियों के स्वामित्व, पुजारी रतनदास के पूजा-अर्चना संबंधी अधिकार और महेश्वरी समाज के श्रद्धालुओं के मंदिर में आने-जाने के अधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट किया।

छह दशक पुराने विवाद में आया अहम पड़ाव

करीब छह दशक से अधिक समय से चले आ रहे इस कानूनी विवाद में हाईकोर्ट के फैसले से मंदिर की संपत्ति के स्वामित्व, पुजारी के अधिकार और श्रद्धालुओं के धार्मिक अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट हुई है। फैसले में देवता के स्वामित्व, परंपरागत पुजारी अधिकार और भक्तों की आस्था—तीनों पहलुओं को अलग-अलग आधार पर विचार किया गया है।


हाईकोर्ट का फैसला देखें      First Appeal No. 59/1968

1 Comments

  1. Judge Sahab Ne Teeno Logo ko Achcha Paisla Diya Hai

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