LAW'S VERDICT

सरकारी जमीन का मालिकाना हक नहीं दे सकती न्याय पंचायत, MP हाईकोर्ट से 27 साल पुरानी अपील खारिज

पाकिस्तान के सिंध से आये विस्थापित को दी गई जमीन से जुड़ा मामला 

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर। 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन के स्वामित्व को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि न्याय पंचायत सरकारी जमीन का मालिकाना हक किसी निजी व्यक्ति को नहीं दे सकती। सरकारी जमीन का शीर्षक (Title) हस्तांतरित करने का अधिकार केवल राजस्व विभाग के सक्षम प्राधिकारी के पास है। जस्टिस विवेक जैन की सिंगल बेंच ने पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए व्यक्ति को वर्ष 1959 में आवंटित बताई गई जमीन के मामले में यह फैसला सुनाया। अदालत ने करीब 27 वर्ष से लंबित अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

40 डिसमिल जमीन के मालिकाना हक का विवाद

मामला सतना जिले के रघुराज नगर में सर्किट हाउस के पास रहने वाले कमलेश कुमार पटेल की ओर से हाईकोर्ट में यह अपील दायर की गई थी। मामला करीब 40 डिसमिल जमीन से जुड़ा था। इस जमीन के स्वामित्व को लेकर अपीलकर्ता का कहना था कि पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र से वर्ष 1947 में विस्थापित होकर भारत आए मूलचंद पोहानी को वर्ष 1959 में यह जमीन दी गई थी। दावा किया गया कि उस समय Rewa Land Revenue and Tenancy Code, 1935 के तहत गठित न्याय पंचायत ने जमीन देने की अनुमति दी थी और इसके लिए 500 रुपए का प्रीमियम भी जमा किया गया था।

न्याय पंचायत की अनुमति के आधार पर बनाया मकान

रिकॉर्ड के अनुसार मूलचंद पोहानी ने जमीन पर मकान बनाकर रहना शुरू किया था। इसके बाद 14 जून 1985 को जमीन लाजपत राय को बेच दी गई। बाद में 16 जनवरी 1987 को लाजपत राय ने जमीन कमलेश कुमार पटेल को बेच दी। हालांकि, 14 अगस्त 1987 को याचिकाकर्ता को जमीन पर अतिक्रमणकारी मानते हुए नोटिस जारी किया गया। इसके बाद विवाद निचली अदालत से होता हुआ हाईकोर्ट पहुंचा और अपील लंबे समय तक लंबित रही।

हाईकोर्ट ने कहा- न्याय पंचायत के पास मालिकाना हक देने का अधिकार नहीं

हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच के बाद स्पष्ट किया कि केवल न्याय पंचायत की ओर से मकान बनाने की अनुमति दिए जाने से जमीन का मालिकाना हक हासिल नहीं हो जाता। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है जिससे यह साबित हो कि संबंधित व्यक्ति या उसके पूर्वज निर्धारित अवधि से पहले से जमीन पर वैध रूप से काबिज थे।

सरकारी जमीन का टाइटल केवल सक्षम राजस्व अधिकारी दे सकता है

कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि जमीन का स्वामित्व राज्य सरकार का है और किसी निजी व्यक्ति का दावा है कि सरकार से उसे मालिकाना हक मिला है, तो ऐसा अधिकार केवल राजस्व विभाग के सक्षम प्राधिकारी द्वारा ही हस्तांतरित किया जा सकता है। अदालत के अनुसार, न्याय पंचायत के पास राज्य सरकार की जमीन का स्वामित्व किसी निजी व्यक्ति के पक्ष में हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं था। इसलिए प्रदर्श P/1 के रूप में पेश न्याय पंचायत की मकान निर्माण संबंधी अनुमति भी अपीलकर्ता के पक्ष में मालिकाना हक स्थापित नहीं करती।

प्रतिकूल कब्जे का दावा भी साबित नहीं हुआ

अपीलकर्ता की ओर से सरकारी जमीन पर लंबे समय से कब्जे के आधार पर adverse possession (प्रतिकूल कब्जे) का दावा भी किया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जिससे यह साबित हो कि संबंधित व्यक्ति या उसके पूर्ववर्ती आवश्यक अवधि से पहले से जमीन पर कब्जे में थे। इसलिए सरकार के खिलाफ adverse possession का दावा भी स्थापित नहीं हो सका।

ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि या perversity नहीं है। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित judgment and decree को बरकरार रखा गया। अदालत ने अंततः अपील को खारिज कर दिया। राज्य सरकार की ओर से पैनल अधिवक्ता केके गौतम ने पैरवी की।

फैसले का महत्वपूर्ण कानूनी संदेश

इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी जमीन पर कब्जा, लंबे समय से निवास या स्थानीय निकाय/न्याय पंचायत की किसी अनुमति मात्र से निजी स्वामित्व का अधिकार पैदा नहीं होता।

यदि सरकारी जमीन का वैध हस्तांतरण हुआ है, तो उसके लिए सक्षम राजस्व प्राधिकारी द्वारा जारी वैधानिक दस्तावेज का होना आवश्यक है। न्याय पंचायत जैसी संस्था राज्य सरकार के स्वामित्व वाली जमीन का टाइटल निजी व्यक्ति के पक्ष में हस्तांतरित नहीं कर सकती।


हाईकोर्ट का आदेश देखें          F.A. No.133 of 1999

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