लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर।
मध्यप्रदेश में न्यायपालिका के लिए बजट आवंटन और कोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को लेकर हाईकोर्ट ने बुधवार को राज्य सरकार पर तल्ख टिप्पणी की। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कहा कि सरकार को एक मुकदमे से कोर्ट फीस के रूप में कम से कम 500 रुपए मिलते हैं, लेकिन एक मुकदमे पर वह महज 87 रुपए खर्च कर रही है।
बेंच ने कहा कि यदि न्यायपालिका को मिलने वाली कोर्ट फीस उसी पर खर्च की जाने लगे तो शायद उसे सरकार से बजट की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से अन्य विभागों की तुलना में न्यायपालिका को अब तक आवंटित बजट का पूरा ब्यौरा पेश करने को कहा है। मामले में डिवीजन बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है और संकेत दिया है कि इस संबंध में विस्तृत फैसला सुनाया जाएगा।
अनूपपुर की कोर्ट बिल्डिंग से जुड़ी है याचिका
डिवीजन बेंच अनूपपुर के अधिवक्ता बासुदेव चटर्जी की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में अनूपपुर जिले में कोर्ट का संचालन किराए के भवन में होने का मुद्दा उठाया गया है। याचिका के अनुसार, 3 फरवरी 2021 से नई कोर्ट बिल्डिंग के निर्माण का मामला लंबित है। इस मुद्दे को लेकर वर्ष 2025 में जनहित याचिका दाखिल की गई थी। इससे पहले 28 जुलाई को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए वित्त सचिव और लॉ सेक्रेटरी को तलब किया था।
‘ज्यूडीशियरी पिलर है, डिपार्टमेंट नहीं’
बुधवार को सुनवाई के दौरान वित्त सचिव मनीष रस्तोगी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में उपस्थित हुए। बातचीत के दौरान उनके द्वारा न्यायपालिका के लिए ‘डिपार्टमेंट’ शब्द इस्तेमाल किए जाने पर बेंच ने आपत्ति जताई। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया ने कहा कि ज्यूडीशियरी संविधान का एक पिलर है, इसलिए इसे विभाग नहीं कहा जाना चाहिए।
इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से बढ़ रही पेंडेंसी
हाईकोर्ट ने कहा कि इंदौर और भोपाल को छोड़कर प्रदेश के अन्य जिलों में न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति चिंताजनक है। कई स्थानों पर जजों के करीब आधे पद खाली हैं। बेंच ने कहा कि यदि नए जजों की नियुक्ति हो भी जाती है, तो उनके बैठने और न्यायिक कार्य करने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं है। इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण मुकदमों का समय पर निपटारा नहीं हो पा रहा और पेंडेंसी लगातार बढ़ रही है।
बजट में बढ़ोतरी को बताया असंतोषजनक
बेंच ने न्यायपालिका के बजट में राज्य सरकार द्वारा की गई बढ़ोतरी को भी संतोषजनक नहीं माना। कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया कि न्यायपालिका के लिए बजट आवंटन करते समय केवल वर्तमान जरूरतों को नहीं, बल्कि अगले 15 से 20 वर्षों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए। मामले में अदालत मित्र के रूप में पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता केसी घिल्डियाल और अधिवक्ता अंशुमान सिंह से भी इस संबंध में सुझाव देने को कहा गया है।
