MP हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सिंगल बेंच का आदेश किया खारिज
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जनभागीदारी समिति के माध्यम से स्वायत्त कॉलेज में नियुक्त कर्मचारियों के स्थाई कर्मचारी के दर्जे से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक सेवा करने के आधार पर जनभागीदारी समिति द्वारा नियुक्त कर्मचारियों को स्थाई कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया जा सकता। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की रिट अपील स्वीकार करते हुए सिंगल बेंच द्वारा 16 अक्टूबर 2025 को पारित उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें सीधी के संजय गांधी स्मृति शासकीय महाविद्यालय के 11 कर्मचारियों को स्थाई कर्मचारी के लाभ देने का निर्देश दिया गया था।
क्या है पूरा मामला?
मामला सीधी स्थित संजय गांधी स्मृति शासकीय महाविद्यालय के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के 11 कर्मचारियों से संबंधित है। कर्मचारियों ने हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के समक्ष याचिका दायर कर दावा किया था कि वे कॉलेज में 15 वर्ष से अधिक समय से लगातार सेवाएं दे रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने सामान्य प्रशासन विभाग की 7 अक्टूबर 2016 की नीति का हवाला देते हुए स्थाई कर्मचारी का दर्जा दिए जाने की मांग की थी। इस नीति के तहत निर्धारित शर्तों के अधीन 16 मई 2007 और 1 सितंबर 2016 तक निरंतर कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को स्थाई कर्मी का दर्जा देने का प्रावधान था। सिंगल बेंच ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें स्थाई कर्मचारी का दर्जा दिए जाने के निर्देश दिए थे। इसके खिलाफ मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग ने डिवीजन बेंच के समक्ष रिट अपील दाखिल की।
16 मई 2007 से निरंतर सेवा का ठोस प्रमाण नहीं
डिवीजन बेंच के समक्ष राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रह्मदत्त सिंह ने पक्ष रखा। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे यह प्रमाणित हो कि वे 16 मई 2007 से लगातार कार्यरत थे। डिवीज़न बेंच ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड में केवल अक्टूबर 2010 के बाद के Labour Charge Bills उपलब्ध थे। ऐसे में केवल इन बिलों के आधार पर कर्मचारियों की 2007 से निरंतर सेवा को प्रमाणित नहीं किया जा सकता।
जनभागीदारी समिति की नियुक्ति से नहीं मिलता नियमित सरकारी कर्मचारी का दर्जा
हाईकोर्ट ने जनभागीदारी समिति की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने 30 सितंबर 1996 की गजट अधिसूचना के संदर्भ में कहा कि जनभागीदारी समिति को राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना कोई नया पद सृजित करने अथवा नियमित सरकारी नियुक्ति करने का अधिकार नहीं है। समिति अपने स्तर पर कॉलेज के कामकाज के लिए किसी व्यक्ति की सेवाएं ले सकती है, लेकिन ऐसी नियुक्ति से संबंधित व्यक्ति राज्य सरकार का नियमित कर्मचारी नहीं बन जाता।
केवल लंबे समय तक काम करना पर्याप्त नहीं
फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी कर्मचारी द्वारा लंबे समय तक सेवा किया जाना अपने आप में स्थाई कर्मचारी का दर्जा पाने का आधार नहीं बन सकता। कर्मचारी को संबंधित सरकारी नीति की आवश्यक शर्तों को पूरा करने के साथ-साथ निर्धारित कट-ऑफ तारीख से निरंतर सेवा का विश्वसनीय दस्तावेजी प्रमाण भी प्रस्तुत करना होगा।
स्वायत्त कॉलेजों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ का भी जिक्र
हाईकोर्ट ने स्वायत्त कॉलेजों की वित्तीय स्थिति को भी ध्यान में रखा। अदालत ने माना कि अधिकांश कॉलेज अब स्वायत्त हैं और उन्हें अपने खर्चों का प्रबंधन स्वयं करना पड़ता है। ऐसे में अतिरिक्त वित्तीय दायित्व डालने का असर कॉलेजों के संसाधनों और शिक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है।
सरकार की अपील मंजूर, सिंगल बेंच का आदेश खारिज
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली। इसके साथ ही सिंगल बेंच द्वारा 16 अक्टूबर 2025 को दिया गया आदेश खारिज कर दिया गया।
डिवीज़न बेंच के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि जनभागीदारी समिति के माध्यम से स्वायत्त कॉलेज में नियुक्त कर्मचारी केवल लंबे समय तक सेवा करने या Labour Charge Bills उपलब्ध होने के आधार पर स्थाई सरकारी कर्मचारी का दर्जा नहीं मांग सकते।
