इंदौर हाईकोर्ट ने 7 साल की बच्ची की हत्या के आरोप में दी गई मौत की सजा उम्र कैद में बदली
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर।
इंदौर में 7 साल की बच्ची की हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बदलकर प्राकृतिक जीवन तक बिना रिमिशन उम्रकैद में तब्दील कर दिया है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस अलोक अवस्थी की डिवीज़न बेंच ने आरोपी की मानसिक स्थिति से जुड़े मेडिकल रिकॉर्ड और उसके पूर्व आपराधिक इतिहास के अभाव को महत्वपूर्ण माना। आरोपी के व्यवहार में बच्चों और लड़कियों को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति से जुड़े मेडिकल रिकॉर्ड को देखते हुए कोर्ट ने उसे (आरोपी को) सामान्य समाज में छोड़ना बेहद खतरनाक माना और स्पष्ट किया कि उम्रकैद में कोई माफ़ी न दी जाए। यानी आरोपी को उसके प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में रहना होगा।
7 साल की बच्ची के अपहरण और हत्या का मामला
यह मामला इंदौर में 23 सितम्बर 2022 को एक 7 साल की बच्ची का अपहरण कर उस पर चाकुओं से वार करके उसकी हत्या किये जाने से जुड़ा था। इंदौर के 13वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एवं विशेष न्यायाधीश द्वारा 31 जनवरी 2023 को आरोपी सद्दाम @ वाहिद पुत्र राशिद को IPC की धारा 363, 364, 342 और 302 तथा POCSO Act की धारा 9(M)/10 के तहत दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने धारा 302 के तहत मौत की सजा सुनाई थी। इसके अलावा अन्य धाराओं में भी अलग-अलग अवधि की सजा और जुर्माना लगाया गया था। मौत की सजा की पुष्टि के लिए मामला CrPC की धारा 366 के तहत हाईकोर्ट के समक्ष Death Reference के रूप में आया था। आरोपी ने भी CrPC की धारा 374(2) के तहत अलग Criminal Appeal दायर की थी।
बच्ची को घर ले जाकर हत्या करने का आरोप
अभियोजन के अनुसार 23 सितंबर 2022 को करीब 7 साल की बच्ची घर के बाहर खेल रही थी। इसी दौरान उसकी चीख सुनकर उसकी नानी बाहर आईं। आरोप है कि उन्होंने आरोपी सद्दाम को बच्ची को अपने घर की ओर ले जाते देखा। आरोप के अनुसार आरोपी बच्ची को घर के अंदर ले गया और दरवाजा बंद कर दिया। नानी ने खिड़की से अंदर देखा तो आरोपी कथित तौर पर बच्ची पर चाकू से हमला कर रहा था। बाद में बच्ची को अस्पताल ले जाया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके शरीर पर 29 चाकू और धारदार हथियार से किए गए घाव पाए गए।
मानसिक बीमारी के दस्तावेजों पर हाईकोर्ट ने किया विचार
अपील में आरोपी की ओर से उसकी मानसिक स्थिति को लेकर कई मेडिकल दस्तावेज पेश किए गए। हाईकोर्ट के समक्ष दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की मानसिक स्थिति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। रिकॉर्ड में मौजूद 5 अप्रैल 2022 के MGM Medical College, Indore के प्रमाणपत्र का हवाला दिया गया, जिसमें आरोपी को Mild Mental Retardation और 50 प्रतिशत मानसिक दिव्यांगता से संबंधित प्रमाणित किया गया था। एक अन्य प्रमाणपत्र में आरोपी को मानसिक रूप से अस्थिर बताया गया था और उसके बिना किसी साथी के यात्रा करने में असमर्थ होने का उल्लेख था।
IQ रिपोर्ट में मानसिक आयु 9 वर्ष बताई गई
हाईकोर्ट के समक्ष पेश 28 फरवरी 2022 की Intelligence Assessment Report में आरोपी की मानसिक आयु करीब 9 वर्ष और IQ 56 बताया गया था। रिपोर्ट में Mild Level of Intellectual Impairment के साथ व्यवहार संबंधी समस्याओं का भी उल्लेख था। एक पुराने डिस्चार्ज कार्ड में आरोपी के व्यवहार में आक्रामकता, सामाजिक संपर्क की कमी और बच्चों को नुकसान पहुंचाने तथा लड़कियों को परेशान करने जैसी व्यवहार संबंधी समस्याओं का उल्लेख होने की बात सामने आई।
कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं मिला
हाईकोर्ट ने 1 जुलाई 2026 को राज्य के अधिवक्ता को सुप्रीम कोर्ट के Manoj & Others v. State of Madhya Pradesh मामले में दिए निर्देशों के अनुसार आरोपी से संबंधित जानकारी प्रस्तुत करने को कहा था। रिपोर्ट में बताया गया कि आरोपी के खिलाफ कोई पूर्व आपराधिक antecedents नहीं मिले और जेल में उसका आचरण संतोषजनक पाया गया।
मौत की सजा के बजाय प्राकृतिक जीवन तक उम्रकैद
हाईकोर्ट ने आरोपी की मानसिक बीमारी और व्यवहार संबंधी मेडिकल इतिहास को देखते हुए माना कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें capital punishment बरकरार रखना उचित होगा। हालांकि, कोर्ट ने मेडिकल रिकॉर्ड में बच्चों और लड़कियों को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति का उल्लेख देखते हुए यह भी माना कि आरोपी की सामान्य समाज में मौजूदगी विशेष रूप से छोटे बच्चों और लड़कियों के लिए अत्यंत खतरनाक हो सकती है। इसी संतुलन को देखते हुए हाईकोर्ट ने मौत की सजा को बदलकर natural life तक life imprisonment without remission कर दिया। आरोपी पर 1,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माना अदा नहीं करने पर उसे 40 दिन का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच पद्धति पर जताई नाराजगी
फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पुलिस की वैज्ञानिक जांच पद्धति को लेकर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी है। कोर्ट ने कहा कि घटनास्थल या मृतका की चोटों को दर्शाने वाली एक भी फोटो रिकॉर्ड पर पेश या प्रमाणित नहीं की गई। कोर्ट ने इसे गंभीर कमी माना, क्योंकि ऐसे मामलों में घटनास्थल और चोटों की तस्वीरें महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती हैं।
29 घाव के बावजूद ब्लड सैंपल ठीक से नहीं लिया
कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर कहा कि आरोपी के घर को घटनास्थल बताया गया था और मृतका को 29 stab तथा cut injuries आई थीं। इसके बावजूद पुलिस ने घटनास्थल से केवल एक swab लिया, जिसमें मृतका का खून पाया गया। DNA रिपोर्ट में इस swab से बहुत कम और uninterpretable Autosomal STR DNA profile मिलने की बात सामने आई। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि कमरे में जहां मृतका को इतनी चोटें लगीं, वहां पर्याप्त मात्रा में रक्त मौजूद होना चाहिए था, लेकिन पुलिस ने घटनास्थल से उचित नमूना नहीं लिया। कोर्ट ने इसे जांच के unscientific और negligent तरीके का उदाहरण माना।
पुलिस को हर मामले में चोटों और घटनास्थल की फोटो लेने का निर्देश
हाईकोर्ट ने पुलिस जांच में सुधार के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मामले में पुलिस को घटनास्थल पर जहां रक्त गिरने का आरोप हो, उसकी तस्वीरें रिकॉर्ड पर पेश और प्रमाणित करनी होंगी। इसके साथ ही घायल व्यक्ति या मृतक की चोटों को स्पष्ट रूप से दिखाने वाली तस्वीरें भी रिकॉर्ड में लाना आवश्यक होगा। कोर्ट ने अपने पहले के Seetu and Others v. State of M.P. मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें चोटों की तस्वीरें लेने के संबंध में निर्देश जारी किए गए थे।
वैज्ञानिक जांच पर हाईकोर्ट का जोर
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में पुलिस को जांच की पारंपरिक पद्धति से आगे बढ़कर अधिक scientific investigation अपनानी चाहिए। घटनास्थल से साक्ष्य का सही तरीके से संग्रह और उसका दस्तावेजीकरण बेहद महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि किसी मामले में अभियोजन को केवल DNA जैसे वैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर अपना केस साबित करना पड़े और पुलिस घटनास्थल से सही नमूने ही न ले पाए, तो गंभीर अपराध का आरोपी भी संदेह का लाभ पाकर बरी हो सकता है।
