LAW'S VERDICT

दिव्यांगता प्रमाण पत्र में 5% अंतर पर डॉक्टरों पर कार्रवाई नहीं, हाईकोर्ट ने पलटा सिंगल बेंच का फैसला

डिवीजन बेंच ने कहा- दिव्यांगता का आकलन चिकित्सीय मूल्यांकन है, तीन-स्तरीय सत्यापन व्यवस्था लागू करने का अधिकार विधायिका का है।

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर। 

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने दिव्यांगता प्रमाण पत्रों में अंतर पाए जाने पर डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई और तीन-स्तरीय सत्यापन व्यवस्था लागू करने संबंधी सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दिव्यांगता का निर्धारण कोई गणितीय गणना नहीं, बल्कि विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा किया जाने वाला चिकित्सीय मूल्यांकन (Medical Assessment) है। ऐसे में अलग-अलग मेडिकल बोर्डों के आकलन में कुछ प्रतिशत का अंतर स्वाभाविक है।

एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कहा कि केवल 5 प्रतिशत से अधिक का अंतर पाए जाने मात्र से किसी डॉक्टर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। जब तक धोखाधड़ी, जालसाजी, जानबूझकर गलत प्रमाण पत्र जारी करने या दुर्भावना (Mala Fide) का स्पष्ट प्रमाण न हो, तब तक डॉक्टर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

राज्य सरकार की अपील मंजूर, सिंगल बेंच का आदेश रद्द

यह फैसला मध्यप्रदेश सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा दायर अपील पर सुनाया गया। राज्य सरकार ने 30 जनवरी 2024 को पारित सिंगल बेंच के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें दिव्यांगता प्रमाण पत्रों की जिला, संभाग और राज्य स्तर पर तीन-स्तरीय जांच व्यवस्था बनाने तथा 5 प्रतिशत से अधिक अंतर मिलने पर संबंधित डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।

कोर्ट बोला- कानून में नहीं है तीन-स्तरीय व्यवस्था

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रह्मदत्त सिंह ने दलील दी कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, उसके तहत बने नियम, राज्य सरकार की अधिसूचनाएं और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने, पुनः सत्यापन और अपील की संपूर्ण वैधानिक व्यवस्था पहले से उपलब्ध कराते हैं।

डिवीजन बेंच ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि कानून में तीन-स्तरीय अनिवार्य सत्यापन प्रणाली का कोई प्रावधान नहीं है। न्यायालय विधायिका द्वारा बनाए गए कानून में संशोधन किए बिना कोई नई व्यवस्था या समानांतर प्रक्रिया लागू नहीं कर सकता।

रिट याचिका के दायरे से बाहर थे निर्देश

हाईकोर्ट ने कहा कि मूल रिट याचिका का उद्देश्य केवल दिव्यांग व्यक्तियों के लिए आरक्षण लागू कराने और बैकलॉग पदों को भरने तक सीमित था। याचिका में न तो दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने की मौजूदा प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी और न ही अतिरिक्त मेडिकल बोर्ड गठित करने की कोई मांग की गई थी।

ऐसे में सिंगल बेंच द्वारा तीन-स्तरीय व्यवस्था लागू करने और डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई संबंधी निर्देश देना रिट याचिका के दायरे से बाहर (Beyond the Scope of the Writ Petition) था।

सरकार चाहे तो कानून बदलकर लागू कर सकती है

डिवीजन बेंच ने कहा कि यदि भविष्य में राज्य सरकार यह मानती है कि तीन-स्तरीय सत्यापन व्यवस्था अधिक प्रभावी होगी, तो वह कानून में आवश्यक संशोधन कर इसे लागू करने पर विचार कर सकती है। लेकिन कानून में संशोधन किए बिना अदालत सरकार को ऐसी व्यवस्था लागू करने का निर्देश नहीं दे सकती।

मौजूदा कानून पर्याप्त, अपील की व्यवस्था पहले से मौजूद

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को दिव्यांगता प्रमाण पत्र से संबंधित आदेश पर आपत्ति है, तो दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत अपील का वैधानिक प्रावधान पहले से उपलब्ध है। कुछ फर्जी प्रमाण पत्रों के सामने आने से यह नहीं माना जा सकता कि पूरी व्यवस्था विफल हो चुकी है।

फैसले का महत्व

यह फैसला मेडिकल बोर्डों और सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि चिकित्सीय मतभेद को अनुशासनात्मक दोष नहीं माना जा सकता, जब तक कि जानबूझकर धोखाधड़ी या फर्जीवाड़े के स्पष्ट साक्ष्य मौजूद न हों। साथ ही अदालत ने यह भी दोहराया कि न्यायालय कानून की व्याख्या कर सकता है, लेकिन विधायिका के स्थान पर नया कानून या नई प्रक्रिया नहीं बना सकता।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     WA-707-2024

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