LAW'S VERDICT

पत्नी की जलकर मौत के मामले में पति 18 साल बाद बरी, हाईकोर्ट ने कहा- संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती

हत्या, आत्महत्या के लिए उकसाने और दहेज प्रताड़ना के आरोप साबित नहीं हुए; जांच में देरी और विरोधाभासी साक्ष्यों पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़ | जबलपुर

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी की जलकर मौत के करीब 18 साल पुराने मामले में हत्या के दोषी पति को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ हत्या, आत्महत्या के लिए उकसाने और क्रूरता के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की डिवीज़न बेंच ने यह भी माना कि मामले की जांच में गंभीर देरी हुई, घटनास्थल का निरीक्षण और साक्ष्य जब्त करने की कार्रवाई काफी समय बाद की गई तथा मेडिकल और अन्य साक्ष्यों से मौत का तरीका निश्चित रूप से हत्या, आत्महत्या या दुर्घटना में से कोई एक साबित नहीं हो सका। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह ठोस साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता।

केरोसिन से जलने के बाद हुई थी पत्नी की मौत

मामला हरदा जिले के टिमरनी थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के अनुसार सुनीता कनेरे की शादी वर्ष 1999 में अशोक कनेरे से हुई थी। दोनों के दो बच्चे थे। 20 अगस्त 2008 को सुनीता गंभीर रूप से जली हुई अवस्था में मिली थीं। उन्हें उपचार के लिए जिला अस्पताल हरदा ले जाया गया, जहां से बाद में चोइथराम अस्पताल, इंदौर रेफर किया गया। उपचार के दौरान 21 अगस्त 2008 को उनकी मौत हो गई। ट्रायल कोर्ट ने मामले में अशोक को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या और धारा 498-A के तहत पत्नी के साथ क्रूरता का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ अशोक ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। आवेदक अशोक की ओर से अधिवक्ता ईशान दत्त ने पैरवी की।

पहले दुर्घटना की बात सामने आई थी

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद मेडिकल साक्ष्यों को महत्वपूर्ण माना। जिला अस्पताल में सुनीता को जब लाया गया, तब वह 100 प्रतिशत जली हुई थीं। मेडिकल लीगल रिपोर्ट में उनके शरीर से केरोसिन की गंध का उल्लेख था। हालांकि अस्पताल में दर्ज हिस्ट्री में यह बताया गया था कि खाना बनाते समय स्टोव की लौ अचानक भड़क गई और सुनीता आग की चपेट में आ गईं। चोइथराम अस्पताल की डॉक्टर डॉ. शोभा चिमनिया ने भी अदालत में बताया कि सुनीता उस समय होश में थीं और उन्होंने स्वयं बताया था कि खाना बनाते समय स्टोव की लौ अचानक भड़कने से वह जल गईं। उन्होंने घटना के लिए किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया था।

पोस्टमार्टम डॉक्टर ने भी नहीं बताई मौत की निश्चित वजह

मामले में पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर डॉ. भारत बाजपेयी ने अदालत में कहा था कि मौत हत्या, दुर्घटना या आत्महत्या—तीनों में से किसी कारण से हो सकती है। हाईकोर्ट ने इस बयान को भी अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण माना, क्योंकि इससे यह निश्चित रूप से साबित नहीं होता कि सुनीता की हत्या की गई थी।

जांच में 27 महीने तक देरी पर सवाल

हाईकोर्ट ने मामले की जांच की टाइमलाइन पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट के मुताबिक घटना 20 अगस्त 2008 की थी, लेकिन मामले में महत्वपूर्ण जांच और साक्ष्य संकलन काफी समय बाद किया गया। घटनास्थल का नक्शा भी घटना के काफी समय बाद तैयार किया गया। स्टोव और अन्य सामान की जब्ती में भी लंबा अंतराल रहा। अदालत ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में कई दस्तावेजों में तारीखों पर ओवरराइटिंग दिखाई देती है। पुलिस अधिकारी के बयान के अनुसार प्रारंभिक मर्ग जांच में कोई अपराध सामने नहीं आया था। बाद में मृतका के पिता और बहन द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से शिकायत किए जाने के बाद मामले की जांच आगे बढ़ी।

2 साल बाद बदले बयानों पर भी हाईकोर्ट की नजर

अभियोजन के महत्वपूर्ण गवाहों के बयानों में देरी और विरोधाभास भी हाईकोर्ट के सामने आए। एक गवाह के बयान के संबंध में अदालत ने पाया कि पुलिस द्वारा उसका एक बयान घटना के काफी समय बाद लिया गया था और बाद में लगभग दो साल के अंतराल के बाद फिर बयान दर्ज किया गया। हाईकोर्ट ने इस देरी को अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता के आकलन में महत्वपूर्ण माना। एक अन्य गवाह विनय कुमार ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया और बचाव पक्ष की जिरह में कहा कि आरोपी को झूठा फंसाया गया है।

मेडिकल विशेषज्ञ की रिपोर्ट ने अभियोजन की कहानी को कमजोर किया

मामले में मेडिको-लीगल इंस्टीट्यूट भोपाल के तत्कालीन निदेशक डॉ. डीएस बडकर की रिपोर्ट भी रिकॉर्ड पर थी। रिपोर्ट में बालों में केरोसिन के अवशेष मिलने और स्टोव के कार्यशील स्थिति में होने का उल्लेख किया गया था। लेकिन हाईकोर्ट ने इस रिपोर्ट के उस हिस्से को महत्वपूर्ण माना, जिसमें मौत के तरीके यानी suicidal या homicidal होने का निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि विशेषज्ञ को अपनी वैज्ञानिक राय पोस्टमार्टम और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर देनी चाहिए, न कि जांच के दौरान पुलिस द्वारा दर्ज किए गए गवाहों के बयानों के आधार पर निष्कर्ष निकालना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा- संदेह साक्ष्य का विकल्प नहीं

मामले के सभी तथ्यों और साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि अशोक ने अपनी पत्नी को केरोसिन डालकर जलाकर मार डाला। कोर्ट ने यह भी पाया कि अभियोजन धारा 306 और 498-A IPC के आरोपों को भी संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। अदालत ने कहा कि जांच में हुई कमियों का लाभ अभियोजन को नहीं दिया जा सकता। यदि ऐसी कमियां अभियोजन के मामले में उचित संदेह पैदा करती हैं, तो उनका लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि “संदेह कितना भी मजबूत हो, वह साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता।”

ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त, आरोपी बरी

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को गलत माना, जिसमें अशोक को हत्या और क्रूरता के आरोपों में दोषी ठहराया गया था। अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने अशोक को धारा 302 IPC, वैकल्पिक रूप से धारा 306 IPC और धारा 498-A IPC के आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे जेल से रिहा किया जाए।

फैसले की प्रमुख बातें

  • पत्नी सुनीता की वर्ष 2008 में जलने से मौत हुई थी।
  • पति अशोक को ट्रायल कोर्ट ने हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
  • हाईकोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास और जांच में देरी पाई।
  • मेडिकल साक्ष्य से मौत का तरीका निश्चित रूप से हत्या साबित नहीं हुआ।
  • मृतका द्वारा अस्पताल में स्टोव की लौ भड़कने से दुर्घटना होने की बात बताए जाने का रिकॉर्ड मौजूद था।
  • गवाहों के बयानों में देरी और विरोधाभास सामने आए।
  • हाईकोर्ट ने कहा कि संदेह के आधार पर आपराधिक दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
  • आरोपी को धारा 302, 306 और 498-A IPC के आरोपों से बरी कर दिया गया।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     CRA-2279-2017

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