MP High Court ने खारिज की याचिका, विभागीय जांच जारी रहेगी
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायिक ईमानदारी और संस्थागत पारदर्शिता को सर्वोच्च महत्व देते हुए इंदौर के पूर्व सिविल जज (सीनियर डिवीजन) विजेंद्र सिंह रावत को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पूर्व जज ने अपने खिलाफ जारी विभागीय जांच और चार्जशीट रद्द करने की मांग की थी।
जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास सर्वोपरि है और केवल इस आधार पर विभागीय जांच नहीं रोकी जा सकती कि उसी मामले में आपराधिक मुकदमा भी लंबित है।
IAS अवार्ड दिलाने के लिए 'फर्जी बरी' का आरोप
मामला क्रिमिनल ट्रायल क्रमांक 1621/2019 (State vs Santosh Verma) से जुड़ा है। आरोप है कि आरोपी संतोष वर्मा का नाम IAS अवार्ड (पदोन्नति) के लिए विचाराधीन था, लेकिन लंबित आपराधिक प्रकरण के कारण प्रक्रिया अटकी हुई थी।
याचिका के अनुसार 6 अक्टूबर 2020 की तारीख का एक कथित कूटरचित (Backdated) निर्णय तैयार किया गया, जिसमें आरोपी को बरी दर्शाया गया, जबकि वास्तविकता में मुकदमा न्यायालय में लंबित था और उसका विधिक रूप से निपटारा नहीं हुआ था। आरोप है कि यह कार्रवाई आरोपी संतोष वर्मा को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की गई।
विजिलेंस जांच के बाद जारी हुई चार्जशीट
हाईकोर्ट की प्रशासनिक विंग की विजिलेंस जांच में कथित अनियमितताओं का खुलासा होने के बाद न्यायिक अधिकारी विजेंद्र सिंह रावत को निलंबित कर दिया गया। इसके बाद दिसंबर 2025 में मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम 14 के तहत विभागीय चार्जशीट जारी की गई।
पूर्व न्यायिक अधिकारी विजेंद्र सिंह रावत ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विभागीय जांच पर रोक लगाने की मांग की थी। उनका तर्क था कि समान आरोपों पर आपराधिक मुकदमा लंबित होने के कारण विभागीय कार्रवाई स्थगित की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट: न्यायपालिका में जनता का विश्वास सर्वोपरि
डिवीजन बेंच ने याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास संवैधानिक व्यवस्था की आधारशिला है और न्यायिक अधिकारियों के आचरण से जुड़े मामलों की जांच को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चार्जशीट जारी होने के प्रारंभिक चरण में न्यायिक हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है। विभागीय अनुशासनात्मक प्राधिकरण कानून के अनुसार जांच आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र है।
विभागीय जांच पर रोक से इनकार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा समानांतर रूप से चल सकते हैं। इसलिए विभागीय कार्यवाही रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। अदालत के इस फैसले के बाद संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच अब आगे जारी रहेगी।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-18568-2026
