करीब 45 मिनिट की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
जस्टिस विशाल मिश्रा को फोन करने के आरोप का मामला
यह मामला 30 अगस्त की उस घटना से जुड़ा है जिसमें जस्टिस विशाल मिश्रा को फोन कर संपर्क करने की कोशिश का आरोप सामने आया था। 1 सितंबर 2025 की सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्रा ने स्वयं इस प्रयास का उल्लेख किया था और संजय पाठक के परिवार से जुड़ी खदानों से संबंधित मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।
इसके बाद 2 अप्रैल को हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया इसे आपराधिक अवमानना का मामला मानते हुए संजय पाठक के खिलाफ नोटिस जारी करने का आदेश दिया था। इससे पहले 21 अप्रैल और 14 मई को भी वह अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए थे।
जब नंबर सेव नहीं था तो डायल कैसे हुआ?
सुनवाई के दौरान विधायक स्नजय पाठक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल ने जस्टिस मिश्रा को कॉल जरूर किया था, लेकिन उन्होंने घंटी जाते ही कॉल डिसकनेक्ट कर दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने बाद में जस्टिस मिश्रा को मेसेज भी भेजा था। इस दलील पर एक्टिंग चीफ जस्टिस ने पूछा कि यदि नंबर मोबाइल में सेव नहीं था, तो डायल कैसे हुआ। इसका तो थी मतलब है कि विधायक के मोबाइल में जस्टिस मिश्रा का नंबर सेव था। इस पर श्री रोहतगी ने कहा कि नंबर किसी का भी सेव हो सकता है। गलती से लगे कॉल के लिए विधायक संजय पाठक ने बिना शर्त माफ़ी मांग ली है। संजय पाठक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल खरे, अधिवक्ता संपूर्ण तिवारी और शमिला इरम फातिमा ने भी अदालत में पक्ष रखा।
या तो जज सही हैं या फिर Mr. रोहतगी
वही शिकायतकर्ता आशुतोष मनु दीक्षित की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी तरह का हस्तक्षेप अवमानना की श्रेणी में आता है। जस्टिस मिश्रा ने अपने आदेश में लिखा कि मुकदमे के सिलसिले में विधायक संजय पाठक ने उनसे चर्च करने की कोशिश की। श्री पाठक के वकील Mr रोहतगी कह रहे कि गलती से कॉल लगा था। अब या तो जस्टिस मिश्रा सही कह रहे हैं या फिर Mr रोहतगी। श्री कामत ने कहा कि 30 अगस्त की कॉल डिटेल्स बुलाने से साफ़ हो जाएगा कि कॉल मिस्ड कॉल था या फिर नंबर डायल होने के बाद बात भी हुई थी।
