LAW'S VERDICT

केवल प्रशासनिक जांच के आधार पर कर्मचारी को 'जालसाज' नहीं ठहराया जा सकता

10 साल पहले रद्द की गई पटवाई की उम्मीदवारी हाईकोर्ट ने बहाल की

ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी पर फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र (DCA/PGDCA) जमा करने का आरोप लगाकर बिना नियमित विभागीय जांच (Departmental Inquiry) के उसकी सेवा समाप्त या उम्मीदवारी रद्द नहीं की जा सकती। जस्टिस आनंद सिंह बेहरावत की एकलपीठ ने मुरैना के एक पटवारी की उम्मीदवारी रद्द करने का 30 मार्च 2015 का आदेश निरस्त करते हुए उसे सभी परिणामी सेवा लाभ (Consequential Benefits) देने के निर्देश दिए हैं।

जस्टिस बेहरावत ने कहा है कि यदि कर्मचारी पर फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने जैसा गंभीर और कलंकित (Stigmatic) आरोप लगाया जाता है, तो मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 (CCA Rules) के तहत नियमित विभागीय जांच करना अनिवार्य है। केवल कलेक्टर की प्रशासनिक जांच या तथ्य संकलन रिपोर्ट के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।

सबलगढ़ में हुई थी पटवारी के रूप में नियुक्ति 

याचिकाकर्ता देवेश शर्मा ने वर्ष 2011 की पटवारी भर्ती परीक्षा में 132.77 अंक प्राप्त किए थे। प्रतीक्षा सूची (Waiting List) में होने के बाद अन्य अभ्यर्थियों के अपात्र घोषित होने पर उसे प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद 19 अगस्त 2013 को सबलगढ़ तहसील में पटवारी नियुक्त किया गया।

नियुक्ति आदेश में छह माह के भीतर विभागीय परीक्षा पास करने की शर्त दी गई थी, लेकिन इस अवधि के पूरा होने से पहले ही 27 सितंबर 2013 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। बाद में हाईकोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर पुनर्नियुक्ति के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद विभाग ने पुनः दस्तावेजों का सत्यापन कर 30 मार्च 2015 को यह कहते हुए उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी कि उसके द्वारा प्रस्तुत DCA/PGDCA प्रमाणपत्र फर्जी है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केएन गुप्ता और अधिवक्ता डीपी सिंह ने पैरवी की।

कलेक्टर का सत्यापन विकल्प नहीं: हाईकोर्ट 

अपने फैसले में जस्टिस बेहरावत ने कहा- कर्मचारी पहले ही चयनित होकर प्रशिक्षण प्राप्त कर चुका था और नियमित रूप से नियुक्त भी हो चुका था। ऐसे में वह CCA Rules के दायरे में आ गया था। यदि विभाग उसके विरुद्ध फर्जी प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने का आरोप लगाता है, तो यह गंभीर दुराचार (Misconduct) और कलंकित आरोप है, जिसे केवल नियमित विभागीय जांच के माध्यम से ही सिद्ध किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा-

कलेक्टर द्वारा किया गया सत्यापन केवल प्रारंभिक तथ्य संकलन (Preliminary Fact Finding) था। यह विभागीय जांच का विकल्प नहीं हो सकता।

विश्वविद्यालय ने भी प्रमाणपत्र को फर्जी नहीं बताया

हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि 8 अप्रैल 2026 को संबंधित विश्वविद्यालय/संस्था द्वारा जारी पत्र में प्रमाणपत्र को फर्जी घोषित नहीं किया गया, बल्कि अभ्यर्थी के नामांकन संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध होने की पुष्टि की गई। ऐसी स्थिति में केवल विभागीय संदेह के आधार पर कर्मचारी को जालसाज घोषित कर दंडित करना कानूनसम्मत नहीं है।

प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन

अदालत ने कहा कि कर्मचारी को न तो आरोप पत्र दिया गया, न जांच अधिकारी नियुक्त किया गया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। यह अनुच्छेद 311(2) तथा मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 का स्पष्ट उल्लंघन है।

हाईकोर्ट के आदेश

हाईकोर्ट ने 30 मार्च 2015 का आदेश निरस्त करते हुए कहा—

  • पटवारी की उम्मीदवारी रद्द करने का आदेश रद्द किया जाता है।
  • चूंकि अंतरिम आदेश के कारण याचिकाकर्ता पहले से सेवा में कार्यरत है, इसलिए पुनर्नियुक्ति की आवश्यकता नहीं है।
  • राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को सभी परिणामी सेवा लाभ तत्काल प्रदान करने के निर्देश दिए गए हैं।
  • यदि भविष्य में संबंधित विश्वविद्यालय या संस्था प्रमाणपत्र को वास्तव में फर्जी घोषित करती है, तो विभाग कानून के अनुसार नई कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।

फैसले का महत्व

यह फैसला स्पष्ट करता है कि सरकारी कर्मचारी पर फर्जी प्रमाणपत्र, धोखाधड़ी या जालसाजी जैसे गंभीर आरोप लगाकर बिना नियमित विभागीय जांच के दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने दोहराया कि प्रशासनिक सत्यापन और विभागीय जांच दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं और किसी कर्मचारी के सेवा अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     W.P. No.2582 of 2015

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