जलापूर्ति परियोजना के अनुबंध विवाद में याचिकाएं खारिज; कोर्ट ने कहा- DAB की कार्यवाही और अहम तथ्य छिपाए, मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा होगी जुर्माने की राशि
जबलपुर। करोड़ों रुपये की जलापूर्ति परियोजना से जुड़े अनुबंध विवाद में वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने के बावजूद सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर करना नागपुर की एक कंपनी को महंगा पड़ गया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कंपनी की याचिकाएं खारिज करते हुए उस पर कुल एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। जुर्माने की राशि मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करने के निर्देश दिए गए हैं।
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कहा कि अनुबंध में विवाद के समाधान के लिए डिस्प्यूट एडजुडिकेशन बोर्ड (DAB) और आर्बिट्रेशन की व्यवस्था मौजूद थी। इसके बावजूद कंपनी ने सीधे रिट याचिका का रास्ता अपनाया। इतना ही नहीं, इससे जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और पूर्व में हुई कार्यवाही की जानकारी भी अदालत के समक्ष पूरी तरह प्रस्तुत नहीं की गई।
2017 में मिला था जलापूर्ति परियोजना का ठेका
याचिकाकर्ता मेसर्स सेंट्रल इंडिया इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड, नागपुर ने मध्य प्रदेश अर्बन डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड (MPUDCL) के साथ वर्ष 2017 में जलापूर्ति परियोजना का अनुबंध किया था। इसके तहत तत्कालीन होशंगाबाद और वर्तमान नर्मदापुरम जिले की बनखेड़ी और सोहागपुर नगर परिषदों में जलापूर्ति परियोजना का काम किया जाना था।
कंपनी का आरोप था कि MPUDCL ने एक अक्टूबर 2021 को स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी कर अनुबंध की मूल शर्तों में एकतरफा बदलाव कर दिया। कंपनी के अनुसार, इससे परियोजना के संचालन एवं रखरखाव की अवधि में भुगतान संबंधी शर्तें बदल गईं और उस पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा।
850 दिनों में पूरा होना था काम, दिसंबर 2024 तक लगा दिया समय
MPUDCL की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता भरत सिंह तथा अधिवक्ता आकाश चौधरी और सिद्धार्थ शर्मा ने याचिका का विरोध किया। उनकी ओर से कोर्ट को बताया गया कि कंपनी को परियोजना का काम 850 दिनों में पूरा करना था, लेकिन निर्धारित अवधि में काम पूरा नहीं किया गया। परियोजना का कार्य 14 दिसंबर 2024 को पूरा हुआ।
प्रतिवादियों की ओर से यह भी कहा गया कि कंपनी जिस SOP और संशोधित प्रक्रिया को चुनौती दे रही है, उससे पहले वर्ष 2019 में ही संशोधित वेरिएशन मेथडोलॉजी लागू की जा चुकी थी। कंपनी ने उस समय इस व्यवस्था को चुनौती नहीं दी थी।
अनुबंध में पहले से था DAB और आर्बिट्रेशन का विकल्प
हाईकोर्ट के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि अनुबंध की FIDIC Gold Book की शर्तों के तहत विवाद समाधान की स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित थी। इसके अनुसार विवाद की स्थिति में पहले Dispute Adjudication Board (DAB) और उसके बाद Arbitration का विकल्प उपलब्ध था।
कोर्ट ने पाया कि कंपनी को DAB के समक्ष अपना विवाद उठाने का अवसर भी मिल चुका था और 24 जुलाई 2023 को DAB अपना निर्णय दे चुका था। यदि कंपनी उस निर्णय से संतुष्ट नहीं थी, तो वह अनुबंध की शर्तों के अनुसार आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया अपना सकती थी।
हाईकोर्ट ने कहा- अनुबंध विवाद तय करना आर्बिट्रेटर का काम
डिवीजन बेंच ने कहा कि SOP और संशोधित वेरिएशन मेथडोलॉजी के कारण वास्तव में अनुबंध की शर्तों में बदलाव हुआ है या नहीं, यह ऐसा विवाद है जिसका निर्धारण आर्बिट्रेटर द्वारा किया जा सकता है।
अदालत ने माना कि अनुबंध में विवाद समाधान की प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध होने के कारण इस तरह के वाणिज्यिक विवाद में सीधे रिट क्षेत्राधिकार के तहत हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।
DAB की कार्यवाही छिपाने पर हाईकोर्ट नाराज
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि याचिकाकर्ता कंपनी ने अपनी रिट याचिका में अनुबंध के आर्बिट्रेशन क्लॉज के साथ DAB के समक्ष हुई कार्यवाही और उससे जुड़े महत्वपूर्ण पत्राचार की पूरी जानकारी अदालत के सामने नहीं रखी।
कोर्ट ने इसे महत्वपूर्ण तथ्यों का दमन मानते हुए कंपनी को राहत देने से इनकार कर दिया।
याचिकाएं खारिज, एक लाख रुपये की लागत
डिवीजन बेंच ने कंपनी की सभी संबंधित रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता चाहे तो अनुबंध के तहत उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं पर कुल एक लाख रुपये की लागत लगाई और राशि मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करने का आदेश दिया।
फैसले का संदेश- अनुबंध में उपाय मौजूद तो सीधे रिट का रास्ता नहीं
हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी ठेकों और वाणिज्यिक अनुबंधों से जुड़े विवादों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। फैसले से यह सिद्धांत फिर रेखांकित हुआ है कि यदि किसी अनुबंध में विवाद निपटाने के लिए DAB और Arbitration जैसी प्रभावी व्यवस्था मौजूद है, तो उसे दरकिनार कर सीधे हाईकोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार का सहारा लेना उचित नहीं है।
साथ ही, अदालत से राहत मांगने वाले पक्ष के लिए मामले से जुड़े सभी महत्वपूर्ण तथ्यों और पूर्व कार्यवाहियों की जानकारी कोर्ट के समक्ष रखना आवश्यक है। महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए जाने की स्थिति में न केवल याचिका खारिज हो सकती है, बल्कि अदालत आर्थिक दंड भी लगा सकती है।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-27926-2025
