LAW'S VERDICT

बालिग अविवाहित बेटी भी पिता से भरण-पोषण की हकदार

MP हाईकोर्ट का फैसला- गलत धारा लिखने से नहीं रुकेगा इंसाफ

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि बालिग अविवाहित बेटी अपनी आजीविका चलाने में सक्षम नहीं है, तो वह पिता से भरण-पोषण पाने की हकदार है। अदालत ने यह भी कहा कि केवल आवेदन में गलत कानूनी धारा का उल्लेख होने के आधार पर किसी जरूरतमंद को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की एकलपीठ ने सतना निवासी गंगा सिंह (दिव्यांग) की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरण-पोषण आदेश को बरकरार रखा और बकाया राशि तत्काल जमा करने के निर्देश दिए। अदालत ने चेतावनी दी कि राशि जमा नहीं करने पर फैमिली कोर्ट वसूली की कड़ी कार्रवाई करे तथा आवश्यक होने पर पिता का बचाव (डिफेंस) भी समाप्त कर दे।

पिता ने दी थी भरण पोषण के आदेश को चुनौती 

सतना में रहने वालीं देवी सिंह और उनकी अविवाहित बेटी रक्षा सिंह ने फैमिली कोर्ट में गुजारा भत्ते के लिए संयुक्त आवेदन दायर किया था। फैमिली कोर्ट ने पत्नी देवी सिंह को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया वैध विवाह साबित नहीं होता, लेकिन बेटी के पक्ष में ₹2,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश पारित किया था। 

इसी आदेश को पिता गंगा सिंह ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पिता की दलील हुई खारिज

पिता की ओर से तर्क दिया गया कि बेटी बालिग हो चुकी है, इसलिए उसे धारा 125 CrPC (अब BNSS) के तहत भरण-पोषण नहीं मिल सकता। यह भी कहा गया कि बेटी ने उनके खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई हैं, इसलिए वह राहत की हकदार नहीं है।

हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि तकनीकी आधार पर न्याय का गला नहीं घोंटा जा सकता।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

अदालत ने कहा कि यदि आवेदन में धारा 125 CrPC के स्थान पर हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20(3) का उल्लेख होना चाहिए था, तब भी केवल गलत धारा लिखे जाने से राहत से इनकार नहीं किया जा सकता। फैमिली कोर्ट दोनों कानूनों के तहत मामले पर विचार कर सकती है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बालिग अविवाहित बेटी को भरण-पोषण पाने के लिए केवल यह साबित करना होगा कि वह अपनी आय या संपत्ति से अपना पालन-पोषण करने में असमर्थ है। इसके लिए किसी शारीरिक या मानसिक दिव्यांगता का होना अनिवार्य नहीं है।

बकाया राशि जमा नहीं की तो होगी सख्त कार्रवाई

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पिता ने अब तक अंतरिम भरण-पोषण की राशि जमा नहीं की है। इस पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि यदि तत्काल भुगतान नहीं किया जाता है तो वसूली की कठोर कार्रवाई की जाए और आवश्यकता पड़ने पर पिता का बचाव भी समाप्त कर दिया जाए।

आवेदन संशोधित करने की भी दी छूट

हाईकोर्ट ने मां और बेटी को यह स्वतंत्रता भी दी कि वे फैमिली कोर्ट में लंबित आवेदन संशोधित कर उसमें धारा 125 CrPC सहपठित धारा 20(3) हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 का उल्लेख जोड़ सकते हैं। इस मामले में मां और बेटी की ओर से अधिवक्ता प्रिया मिश्रा ने पैरवी की।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     CRIMINAL REVISION NO.4968 of 2024

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