LAW'S VERDICT

इंदौर के व्यापारी ने फर्जी चेक देकर हड़पी जमीन: MP हाईकोर्ट ने कहा- सच्चाई ट्रायल में आएगी, मुकदमा तो पूरा चलेगा

हाईकोर्ट ने पकड़ा इंदौर के व्यापारी का खेल, अब सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट करेगा फैसला

इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति का आरोप है कि झूठे वादे, धोखाधड़ी और छलपूर्वक बिक्री विलेख (Sale Deed) कराया गया, तो केवल इस आधार पर कि विक्रय विलेख पंजीकृत है, मुकदमा प्रारंभिक स्तर पर Order 7 Rule 11 CPC के तहत खारिज नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में साक्ष्य लेकर ट्रायल होना आवश्यक है।

जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की सिंगल बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा वादपत्र (Plaint) खारिज करने का आदेश निरस्त करते हुए मामला दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।

क्या है पूरा मामला?

इंदौर जिले के किसान दौलत पटेल ने अपनी सोनवाय गाँव में स्थित 1.082 हेक्टेयर कृषि भूमि करीब 1.04 करोड़ रुपये में बेचने के लिए बिक्री विलेख निष्पादित किया था। खुद को सियागंज (इंदौर) का व्यापारी बताने वाले नरेंद्र परमार ने भुगतान के लिए दौलत को पोस्ट-डेटेड चेक दिए।

दौलत का आरोप था कि जब वह चेक बैंक में जमा कराने पहुंचा तो पता चला कि एक चेक की राशि गलत भरी गई है। खरीदारनरेंद्र परमार ने गलती सुधारने का भरोसा देकर सभी चेक वापस ले लिए और नए चेक देने का वादा किया, लेकिन बाद में न तो नए चेक दिए और न ही कोई भुगतान किया।

वादी ने आरोप लगाया कि खरीदार ने शुरू से ही भुगतान करने का इरादा नहीं रखा और धोखाधड़ी एवं छलपूर्वक रजिस्ट्री करा ली।

ट्रायल कोर्ट ने क्यों खारिज किया था मुकदमा?

ट्रायल कोर्ट ने माना कि बिक्री विलेख का निष्पादन स्वीकार है और विवाद केवल बिक्री मूल्य के भुगतान का है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के Dahiben v. Arvindbhai Kalyanji Bhanusali (2020) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि वादी केवल बिक्री राशि की वसूली का दावा कर सकता है, बिक्री विलेख निरस्त कराने का नहीं।

इसी आधार पर Order 7 Rule 11 CPC के तहत 2 अगस्त 2024 को दौलत पटेल का मुकदमा खारिज कर दिया गया। इसी फैसले के खिलाफ यह अपील हाईकोर्ट में दौलत ने दाखिल की थी।

हाईकोर्ट ने कहा—यह सिर्फ भुगतान का नहीं, धोखाधड़ी का मामला

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने वादपत्र का समग्र अध्ययन नहीं किया। वादी का मामला केवल बिक्री मूल्य न मिलने का नहीं, बल्कि यह है कि खरीदार ने शुरू से ही धोखा देने की मंशा से झूठे आश्वासन देकर बिक्री विलेख कराया।

अदालत ने कहा कि वादपत्र में स्पष्ट रूप से फ्रॉड, छल और कपट के आरोप लगाए गए हैं। ऐसे आरोपों की सच्चाई बिना साक्ष्य दर्ज किए तय नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट के Dahiben फैसले को बताया अलग

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने Dahiben मामले को गलत तरीके से लागू किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि उस मामले में वादी ने लगभग पांच साल बाद बिक्री विलेख निरस्त कराने का मुकदमा दायर किया था और परिस्थितियां पूरी तरह अलग थीं।

वर्तमान मामले में बिक्री विलेख 6 अप्रैल 2022 को हुआ और वादी ने करीब आठ महीने के भीतर ही मुकदमा दायर कर दिया। इसलिए दोनों मामलों की परिस्थितियां समान नहीं हैं।

Section 55 Transfer of Property Act पर भी हाईकोर्ट की टिप्पणी

प्रतिवादी ने तर्क दिया कि Transfer of Property Act की धारा 55 के अनुसार विक्रेता केवल बकाया बिक्री राशि की वसूली कर सकता है।

हाईकोर्ट ने यह दलील भी खारिज करते हुए कहा कि धारा 55 तभी लागू होती है जब बिक्री विलेख वैध रूप से निष्पादित हुआ हो। यहां विवाद ही इस बात का है कि बिक्री विलेख धोखाधड़ी और छल के आधार पर कराया गया।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पक्षकारों के साक्ष्य रिकॉर्ड किए बिना विवाद का निर्णय संभव नहीं है। इसलिए Order 7 Rule 11 CPC के तहत वादपत्र खारिज करना उचित नहीं था।

अदालत ने ट्रायल कोर्ट का 2 अगस्त 2024 का आदेश रद्द करते हुए मुकदमा पुनः बहाल कर दिया और ट्रायल कोर्ट को सभी पक्षों के साक्ष्य लेकर विधि अनुसार सुनवाई करने के निर्देश दिए।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     FA-1737-2024

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