LAW'S VERDICT

दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात में देरी पर हाई कोर्ट सख्त, बोला- कानूनन अधिकार है तो कोर्ट क्यों भेज रहे डॉक्टर?

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िताओं के मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) मामलों में स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टरों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस विशाल मिश्रा की कोर्ट ने कहा कि जब मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 डॉक्टरों को तय परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति देने का स्पष्ट अधिकार देता है, तब पीड़िताओं को अनावश्यक रूप से अदालत भेजना कानून की भावना के विपरीत है।

हाई कोर्ट ने मंडला के सिविल सर्जन और अस्पताल के सहायक मुख्य चिकित्सा अधीक्षक से जवाब तलब किया है। साथ ही स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव और संचालक को पूरे प्रदेश के डॉक्टरों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने के आदेश दिए हैं।

17 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता का मामला बना वजह

मामला 17 वर्षीय नाबालिग सामूहिक दुष्कर्म पीड़िता से जुड़ा है, जो लगभग 10 सप्ताह की गर्भवती थी। पीड़िता और उसकी मां की लिखित सहमति होने के बावजूद डॉक्टरों ने स्वयं निर्णय लेने के बजाय मामला हाई कोर्ट की अनुमति के लिए भेज दिया।

इस पर अदालत ने कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में अधिकारी अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल रहे हैं और अनावश्यक देरी से पीड़िता को मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ रही है।

हाई कोर्ट ने बताया- MTP Act में क्या है प्रावधान

अदालत ने स्पष्ट किया कि MTP Act, 1971 के तहत—

  • 20 सप्ताह तक की गर्भावस्था में एक पंजीकृत चिकित्सक (RMP) की राय पर गर्भपात किया जा सकता है।
  • 20 से 24 सप्ताह तक की गर्भावस्था में दो पंजीकृत चिकित्सकों की राय आवश्यक होती है।
  • 18 वर्ष से कम आयु की पीड़िता के मामले में माता-पिता या विधिक अभिभावक की लिखित सहमति पर्याप्त है।

कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में गर्भ केवल 10 सप्ताह का था, इसलिए डॉक्टरों के पास स्वयं निर्णय लेने का पूरा कानूनी अधिकार था।

हाई कोर्ट के 5 अहम निर्देश

पीड़िता के हित में अदालत ने तत्काल गर्भपात की अनुमति देते हुए ये निर्देश दिए—

  • विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम बिना देरी प्रक्रिया पूरी करे।
  • प्रक्रिया के दौरान आवश्यक विशेषज्ञ, जिनमें बाल रोग विशेषज्ञ और रेडियोलॉजिस्ट शामिल हों, उपलब्ध रहें।
  • आपराधिक मुकदमे के साक्ष्य के लिए भ्रूण का डीएनए सुरक्षित रखकर पुलिस को सौंपा जाए।
  • गर्भपात के बाद पीड़िता को समुचित चिकित्सा सुविधा और देखभाल उपलब्ध कराई जाए।
  • यदि प्रक्रिया के दौरान शिशु जीवित जन्म लेता है तो उसके उपचार और देखभाल की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार निभाए।

पूरे प्रदेश के लिए जारी होंगे निर्देश

हाई कोर्ट ने आदेश की प्रति स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव और संचालक को भेजने का निर्देश देते हुए कहा कि पूरे प्रदेश के डॉक्टरों को MTP Act के प्रावधानों के संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं, ताकि भविष्य में किसी भी दुष्कर्म पीड़िता को केवल प्रशासनिक लापरवाही या कानूनी भ्रम के कारण अदालत का दरवाजा न खटखटाना पड़े।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     WP-25213-2026

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