LAW'S VERDICT

ग्वालियर हाईकोर्ट बोला- 'क्या पुलिस सुरक्षा का आदेश शादी का आठवां फेरा बन गया है?'

वकील द्वारा 40 हजार लेकर शादी और पुलिस सुरक्षा के 'पैकेज' पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, आर्य समाज संस्था पर भी सवाल 

ग्वालियर। मप्र हाईकोर्ट ने प्रेम विवाह के एक मामले पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा- यह विचारणीय है कि पुलिस सुरक्षा का आदेश अब शादी का आठवाँ फेरा बन गया है। ग्वालियर के एक वकील द्वारा 40 हजार रूपए लेकर एक नव युगल की शादी कराकर उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाये जाने पर जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की डिवीज़न बेंच ने कड़ी नाराजगी जताई। बेंच ने कहा- अधिवक्ताओं को अपनी पेशेवर जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए युवाओं का शोषण नहीं करना चाहिए और बिना वास्तविक खतरे के केवल औपचारिकता के तौर पर पुलिस सुरक्षा याचिकाएं दाखिल नहीं करनी चाहिए। बेंच ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए यहाँ तक कहा- इस परंपरा से ऑनर किलिंग जैसे इससे वास्तविक खतरे वाले मामलों पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

डिवीज़न बेंच मुरैना में रहने वाली एक महिला की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी। दरअसल, महिला ने अपनी बेटी के लापता होने को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट के आदेश पर पेश की गई युवती (कॉर्पस) ने बताया कि वह अपनी इच्छा से शादी करना चाहती थी। इसके लिए वह और उसका पति अधिवक्ता आकाश गोयल के पास पहुंचे, जिसने कथित तौर पर ₹40 हजार लेकर शादी कराने और हाईकोर्ट से पुलिस सुरक्षा का आदेश दिलाने का आश्वासन दिया। युवती के अनुसार उसी अधिवक्ता ने दोनों की शादी आर्य समाज संस्कृति संस्थान, ग्वालियर में कराई और बाद में हाईकोर्ट में याचिका भी दाखिल कराई।

'कोर्ट के आदेश का मतलब भी नहीं समझाया'

युवती ने अदालत को बताया कि पुलिस सुरक्षा का आदेश मिलने के बाद अधिवक्ता ने उन्हें यह कहकर गुमराह किया कि अब पुलिस से सहयोग करने की आवश्यकता नहीं है और वे अपनी इच्छा से कहीं भी रह सकते हैं।

हालांकि उसने यह भी स्पष्ट किया कि वह बालिग है, अपनी मर्जी से विवाह किया है, किसी के अवैध कब्जे में नहीं है और अपने पति के साथ ही रहना चाहती है।

हाईकोर्ट ने आर्य समाज संस्था पर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता  राजेश कुमार शुक्ला ने स्वीकार किया कि अब तक यह जांच नहीं की गई कि आर्य समाज संस्कृति संस्थान को विवाह कराने का कानूनी अधिकार है या नहीं। न तो संस्था के पंजीयन की जांच हुई और न ही उसके उपनियमों का सत्यापन किया गया। उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि संस्था की वैधानिक स्थिति और उसके माध्यम से कराई जा रही शादियों की जांच जारी रहेगी।

वास्तविक मामलों पर पड़ सकता है असर

कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस सुरक्षा की याचिकाएं केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बन जाएंगी, तो ऑनर किलिंग जैसे वास्तविक खतरे वाले मामलों में न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव पड़ेगा और गंभीर मामलों को नुकसान हो सकता है।

याचिका का निपटारा, पति के साथ भेजने के निर्देश

सुनवाई के बाद दिए आदेश में डिवीज़न बेंच ने कहा- चूंकि युवती बालिग है, अपनी इच्छा से पति के साथ रह रही है और उसने किसी प्रकार के खतरे से इनकार किया, इसलिए हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए पुलिस को आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर युवती को उसके पति के साथ भेजने के निर्देश दिए।


हाईकोर्ट का आदेश देखें      WP-22487-2026

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