रतलाम की सत्र अदालत का आदेश रद्द करके हाईकोर्ट ने मामले पर फिर से सुनवाई के आदेश दिए
इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि महज 12 दिन की देरी के आधार पर किसी व्यक्ति के प्रथम अपील के वैधानिक अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि न्यायालयों को तकनीकीताओं के बजाय वास्तविक न्याय को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने रतलाम की सत्र अदालत का आदेश निरस्त करते हुए मामले को दोबारा मेरिट पर सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।
जस्टिस जेके पिल्लई की एकलपीठ ने यह आदेश एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर पारित किया।
12 दिन की देरी से दायर हुई थी अपील
मामला रतलाम जिले के जावरा का है। याचिकाकर्ता भेरूसिंह को परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस मामले में ट्रायल कोर्ट ने 30 जनवरी 2026 को दोषी ठहराते हुए कारावास की सजा और ₹1.40 लाख मुआवजा 6 प्रतिशत ब्याज सहित जमा करने का आदेश दिया था।
इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने सत्र न्यायालय में अपील दायर की, लेकिन अपील 12 दिन की देरी से दाखिल हुई। देरी माफ करने के लिए आवेदन में ग्रामीण पृष्ठभूमि, समय-सीमा की जानकारी नहीं होना तथा बीच में न्यायालयों की छुट्टियों का हवाला दिया गया।
सत्र अदालत ने बिना मेरिट सुने ही खारिज कर दी अपील
द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, जावरा ने देरी माफ करने से इनकार करते हुए अपील को केवल सीमाबद्धता (Limitation) के आधार पर खारिज कर दिया। इसके कारण अपीलकर्ता के मामले की मेरिट पर सुनवाई ही नहीं हो सकी।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि अधीनस्थ अपीलीय अदालत ने मामले की वास्तविक कानूनी और तथ्यात्मक जांच किए बिना केवल तकनीकी आधार पर पूरी कार्यवाही समाप्त कर दी।
अदालत ने टिप्पणी की कि 12 दिन की देरी बेहद मामूली थी, जिसे उदार और न्यायोन्मुखी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए था। इसके बजाय सत्र अदालत ने "अति-तकनीकी, कठोर और यांत्रिक (Hyper-technical, Rigid and Pedantic)" रवैया अपनाया, जिससे अपीलकर्ता अपने प्रथम वैधानिक अपील के अधिकार से वंचित हो गया।
सरेंडर नियम भी लागू नहीं होगा
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट नियम, 2008 के नियम-48 के तहत सरेंडर की अनिवार्यता लागू नहीं होगी, क्योंकि सत्र अदालत ने मामले की मेरिट पर कोई निर्णय ही नहीं दिया था।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में सरेंडर की शर्त लागू करना अनावश्यक और अत्यधिक प्रक्रियात्मक कठिनाई पैदा करेगा।
सत्र अदालत को दिए नए निर्देश
हाईकोर्ट ने सत्र अदालत का 2 अप्रैल 2026 का आदेश निरस्त करते हुए 12 दिन की देरी माफ कर दी और निर्देश दिया कि अपील पर मेरिट के आधार पर सुनवाई कर नया फैसला सुनाया जाए।
साथ ही याचिकाकर्ता को 30 दिन के भीतर सत्र न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। तब तक उसे सरेंडर से छूट भी प्रदान की गई।
हाईकोर्ट का संदेश
फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालयों का उद्देश्य तकनीकी आधार पर मामलों को समाप्त करना नहीं, बल्कि वास्तविक और सार्थक न्याय सुनिश्चित करना है। मामूली देरी के कारण किसी नागरिक के प्रथम अपील के वैधानिक अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का आदेश देखें CRR 1718/2026
