LAW'S VERDICT

15 साल पुराने फर्जी एनकाउंटर केस में पूर्व थाना प्रभारी को अग्रिम जमानत, हाईकोर्ट बोला- 10 साल जांच में गिरफ्तारी नहीं हुई तो अब क्यों?

CBI के फर्जी एनकाउंटर केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, समान भूमिका वाले 14 सह-आरोपी पहले ही जमानत पर 

इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बैसला घाट के वर्ष 2009 के चर्चित कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में आरोपी तत्कालीन थाना प्रभारी परशुराम सिंह परमार को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे दी है।  जस्टिस जेके पिल्लई की सिंगल बेंच ने कहा कि जब CBI ने 10 वर्षों की जांच के दौरान आरोपी को गिरफ्तार करना आवश्यक नहीं समझा, तो चार्जशीट दाखिल होने के बाद केवल औपचारिकता के लिए गिरफ्तारी उचित नहीं मानी जा सकती। अदालत ने यह भी माना कि मामले के 14 अन्य सह-आरोपी पहले ही जमानत पर हैं, इसलिए समानता (Parity) के सिद्धांत का लाभ वर्तमान आवेदक को भी मिलना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला CBI New Delhi द्वारा दर्ज अपराध से जुड़ा है। आरोप है कि 7-8 फरवरी 2009 की रात पुलिस टीम ने बैंसला घाट पर एक कथित फर्जी मुठभेड़ (Fake Encounter) में एक मानसिक रूप से दिव्यांग निर्दोष व्यक्ति की हत्या कर उसे कुख्यात अपराधी बंसी गुर्जर बताकर पेश किया। CBI के अनुसार बाद में वास्तविक बंसी गुर्जर वर्ष 2012 में जीवित गिरफ्तार हुआ, जिसके बाद जांच हाईकोर्ट के आदेश पर CBI को सौंपी गई।

हाईकोर्ट ने किन आधारों पर दी राहत?

अदालत ने अपने आदेश में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया—

10 साल तक गिरफ्तारी नहीं हुई

हाईकोर्ट ने कहा कि CBI ने 2014 से 2025 तक जांच की, लेकिन इस दौरान आवेदक को कभी गिरफ्तार नहीं किया। यदि जांच एजेंसी को हिरासत की आवश्यकता नहीं लगी, तो चार्जशीट दाखिल होने के बाद गिरफ्तारी का औचित्य कमजोर हो जाता है।

14 सह-आरोपी पहले से जमानत पर

कोर्ट ने माना कि मामले के 15 आरोपियों में से 14 पहले ही नियमित या अग्रिम जमानत प्राप्त कर चुके हैं, जिनमें पूरी कार्रवाई का नेतृत्व करने वाले तत्कालीन एसडीओपी अनिल पाटीदार भी शामिल हैं। ऐसे में समान भूमिका वाले आवेदक को जमानत से वंचित करने का कोई ठोस आधार नहीं है।

सही है मृतक का पहचान पंचनामा 

CBI का आरोप था कि आवेदक ने मृतक की गलत पहचान कराई, लेकिन अदालत ने कहा कि 08 फरवरी 2009 के पहचान पंचनामा में कई स्वतंत्र गवाहों और कार्यपालिक मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर हैं। इसलिए इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी पहचान प्रक्रिया केवल आवेदक ने प्रभावित की थी। यह तथ्य ट्रायल में परीक्षण का विषय होगा।

गंभीर बीमारी का भी मिला लाभ

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आवेदक वरिष्ठ नागरिक हैं और रीढ़ की नस दबने (Severe Spinal Nerve Compression) के कारण पूरी तरह बिस्तर पर हैं। मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार उनके चारों अंग प्रभावित हैं और तत्काल सर्जरी की आवश्यकता है।

CBI ने किया था विरोध

CBI ने दलील दी कि यह फर्जी एनकाउंटर और हत्या का गंभीर मामला है तथा आवेदक प्रभावशाली पूर्व पुलिस अधिकारी होने के कारण गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। CBI ने यह भी कहा कि आरोपी चार्जशीट में फरार (Absconder) दर्शाया गया है।

हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि आवेदक द्वारा जांच के दौरान CBI के नोटिसों का पालन करने और पॉलीग्राफ टेस्ट में शामिल होने का दावा भी रिकॉर्ड पर है, जिसकी विस्तृत जांच ट्रायल में होगी।

एक लाख के निजी मुचलके पर अग्रिम जमानत

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में परशुराम सिंह परमार को एक लाख रुपये के निजी मुचलके और समान राशि के एक जमानतदार पर रिहा किया जाए। साथ ही उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 482(2) के तहत निर्धारित सभी शर्तों का पालन करना होगा।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     MCRC NO.26041/2026

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