LAW'S VERDICT

टीबी मुक्त भारत अभियान में हाईकोर्ट दखल नहीं देगा, याचिका खारिज

रेडियोग्राफर्स संघ ने लगाईं थी इंदौर हाईकोर्ट में याचिका 

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 'टीबी मुक्त भारत अभियान' के तहत हैंडहेल्ड एक्स-रे मशीनों के उपयोग और रेडियोग्राफर्स को दिए गए दैनिक लक्ष्यों को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की अदालत ने कहा है कि राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य नीतियों और उनके प्रशासनिक क्रियान्वयन में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित है तथा केवल आशंकाओं के आधार पर ऐसी योजनाओं को रोका नहीं जा सकता।

मामले में याचिकाकर्ता प्रगतिशील रेडियोग्राफर्स संघ ने केंद्रीय टीबी प्रभाग और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्यप्रदेश द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को चुनौती दी थी।

केंद्र सरकार की गाइडलाईन के खिलाफ लगी थी याचिका

याचिका में अगस्त 2023 की केंद्रीय टीबी प्रभाग की गाइडलाइंस और 10 नवंबर 2025 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) मध्यप्रदेश द्वारा जारी आदेश को चुनौती दी गई थी।

संघ का कहना था कि नीमच, झाबुआ और बड़वानी जैसे जिलों में रेडियोग्राफर्स को गांवों और स्वास्थ्य शिविरों में जाकर प्रतिदिन 100 से 150 चेस्ट एक्स-रे करने का लक्ष्य दिया गया है, जो व्यवहारिक और सुरक्षित नहीं है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता रोमेश दावे और राज्य सरकार की ओर से उप शासकीय अधिवक्ता कुशाग्र सिंह ने दलीलें रखीं ।

याचिकाकर्ताओं की प्रमुख आपत्तियां

1. रेडिएशन सुरक्षा पर सवाल

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि हैंडहेल्ड एक्स-रे मशीन (HHXray) से रेडिएशन जोखिम "लगभग शून्य" होने का दावा केवल निर्माता कंपनी की जानकारी पर आधारित है और इसका स्वतंत्र वैज्ञानिक सत्यापन उपलब्ध नहीं है।

2. सुरक्षा संसाधनों का अभाव

संघ का कहना था कि पंचायत भवनों, स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों में लगाए जा रहे शिविरों में रेडिएशन सुरक्षा के मानक उपाय उपलब्ध नहीं हैं। कई स्थानों पर न तो लेड-लाइनिंग है और न ही रेडियोग्राफर्स को टीएलडी (Thermoluminescent Dosimeter) बैज उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

3. रेडिएशन भत्ता बढ़ाने की मांग

याचिका में यह भी कहा गया कि मध्यप्रदेश में रेडियोग्राफर्स को दशकों से मात्र 50 रुपये प्रतिमाह रेडिएशन भत्ता दिया जा रहा है, जो वर्तमान परिस्थितियों में अपर्याप्त है।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

अदालत ने सुनवाई के बाद कहा कि—

स्वास्थ्य नीति न्यायिक समीक्षा का सीमित क्षेत्र

टीबी उन्मूलन जैसी राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाएं व्यापक जनहित से जुड़ी होती हैं। ऐसे मामलों में न्यायालय को अत्यधिक संयम बरतना चाहिए और विशेषज्ञ संस्थाओं के निर्णयों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

प्रशासनिक लक्ष्य तय करना सरकार का अधिकार

कोर्ट ने माना कि प्रतिदिन 100-150 एक्स-रे का लक्ष्य निर्धारित करना अभियान के प्रभावी संचालन के लिए एक प्रशासनिक उपाय है। केवल यह कहना कि लक्ष्य कठिन है, उसे मनमाना या अवैध नहीं बनाता।

आशंकाएं पर्याप्त आधार नहीं

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत निजी परीक्षणों, अनौपचारिक प्रयोगों या व्यक्तिगत आशंकाओं को आधिकारिक वैज्ञानिक निष्कर्षों का विकल्प नहीं माना जा सकता। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे कर्मचारियों को वास्तविक नुकसान सिद्ध हो।

हाईकोर्ट ने माना- सेवा नियमों का उल्लंघन नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि रेडियोग्राफर्स के सेवा नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो सरकार को उन्हें फील्ड कैंपों में तैनात करने या दैनिक कार्य लक्ष्य निर्धारित करने से रोकता हो।

अदालत के अनुसार, जब तक किसी वैधानिक प्रावधान, सेवा नियम या संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन साबित न हो, तब तक अनुच्छेद 226 के तहत रिट ऑफ मैंडेमस जारी कर प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने याचिका को बताया आधारहीन

अंततः हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य नीति और उसके क्रियान्वयन को रोकने या संशोधित करने का कोई पर्याप्त कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसलिए याचिका को "मेरिट और आधार से रहित" (Devoid of substance and merit) मानते हुए खारिज कर दिया गया।

यह फैसला इस सिद्धांत को पुनः स्थापित करता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी नीतियों के मामलों में अदालतें तभी हस्तक्षेप करेंगी जब स्पष्ट रूप से कानून, संविधान या सेवा नियमों का उल्लंघन सिद्ध हो।


हाईकोर्ट का आदेश देखें    W.P. No. 17859/2026

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