LAW'S VERDICT

Public Trust को दी गई छूट कभी भी वापस ले सकती है सरकार

हाईकोर्ट ने खारिज की श्री देव दत्तात्रय मंदिर ट्रस्ट की याचिका

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार को अपने द्वारा जारी किसी भी अधिसूचना या आदेश को वापस लेने, संशोधित करने अथवा रद्द करने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि जनरल क्लॉज एक्ट की धारा 21 सरकार को अपने पूर्व आदेशों में बदलाव करने या उन्हें निरस्त करने की अंतर्निहित शक्ति प्रदान करती है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सागर जिले के गौरझामर स्थित श्री देव दत्तात्रय मंदिर ट्रस्ट को दी गई छूट वापस लेने के राज्य सरकार के निर्णय को वैध ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकलपीठ ने कहा कि सरकार द्वारा किसी पब्लिक ट्रस्ट को दी गई छूट स्थायी अधिकार नहीं बन जाती। यदि परिस्थितियां और कानून इसकी अनुमति देते हैं तो सरकार उस छूट को वापस भी ले सकती है।

क्या है पूरा मामला?

याचिका सागर जिले की देवरी तहसील के ग्राम गौरझामर निवासी अरुण कुमार शेण्डे (अब दिवंगत) एवं अन्य की ओर से वर्ष 2007 में दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वर्ष 1943 में उनके पिता विश्वनाथ राव शिंदे के नाम मंदिर और उससे संबंधित कृषि भूमि की रजिस्ट्री हुई थी, इसलिए यह एक निजी मंदिर है।

हालांकि वर्ष 1970 में रजिस्ट्रार पब्लिक ट्रस्ट ने मंदिर को सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने मध्य प्रदेश पब्लिक ट्रस्ट एक्ट की धारा 36(2) के तहत मंदिर को अधिनियम के प्रावधानों से मुक्त किए जाने का आवेदन राज्य सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया।

2005 में मिली थी छूट

तत्कालीन एसडीएम और कलेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार ने 5 जनवरी 2005 को आदेश जारी कर ट्रस्ट को पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के प्रावधानों से छूट प्रदान कर दी थी। लेकिन बाद में सरकार ने 13 सितंबर 2007 को उक्त छूट वापस ले ली। इसी आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

हाईकोर्ट ने सरकार के अधिकार को माना वैध

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह प्रश्न था कि क्या सरकार अपने ही द्वारा जारी छूट संबंधी आदेश को वापस ले सकती है। अदालत ने कहा कि जनरल क्लॉज एक्ट की धारा 21 के अनुसार जिस प्राधिकारी को आदेश जारी करने की शक्ति है, उसे आवश्यक परिस्थितियों में उसे संशोधित या वापस लेने की शक्ति भी प्राप्त होती है।

अदालत ने माना कि राज्य सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर निर्णय लिया है और इसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है। इसलिए याचिका में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने रखे पक्ष

मामले में अनावेदकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, अधिवक्ता यशवंत सिंह लोधी और भूमिका केशरवानी ने पक्ष रखा। वहीं राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता वीएस चौधरी ने दलीलें प्रस्तुत कीं।

सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश को विधिसम्मत मानते हुए याचिका खारिज कर दी।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     WP-14329-2007

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