LAW'S VERDICT

'गलती अफसरों की, सजा मालिक क्यों भुगते?'

इंदौर नगर निगम की मनमानी पर हाईकोर्ट ने कहा, मकान गिराने की कार्रवाई की खारिज 

इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में इंदौर नगर निगम द्वारा भवन अनुमति रद्द कर मकान तोड़ने की कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की अदालत ने कहा कि जब निगम के अधिकारियों ने स्वयं स्थल का निरीक्षण कर भवन निर्माण की अनुमति दी थी, तब बिना किसी धोखाधड़ी या तथ्य छिपाने के प्रमाण के लगभग दो वर्ष बाद अनुमति रद्द नहीं की जा सकती। अदालत ने 9 मई 2019 का अनुमति निरस्तीकरण आदेश तथा 11 सितंबर 2019 और 4 फरवरी 2020 के ध्वस्तीकरण नोटिसों को रद्द करते हुए 27 जुलाई 2017 को दी गई भवन अनुमति को पुनः बहाल कर दिया।

चैन सिंह के बग़ीचे का था मामला

याचिकाकर्ता माजू चावला व अन्य ने इंदौर के चैन सिंह का बगीचा क्षेत्र स्थित अपने मकान के लिए वर्ष 2017 में भवन निर्माण की अनुमति प्राप्त की थी। अनुमति देने से पहले नगर निगम ने सार्वजनिक सूचना प्रकाशित कर आपत्तियां आमंत्रित की थीं और आवश्यक जांच के बाद नक्शा स्वीकृत किया था। भवन अनुमति मिलने के बाद याचिकाकर्ताओं ने तीन मंजिला निर्माण का अधिकांश कार्य पूरा कर लिया।

इसके लगभग दो वर्ष बाद निगम ने यह कहते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया कि भवन के सामने 18 मीटर चौड़ी सड़क दर्शाई गई है, जबकि प्रस्तावित मास्टर प्लान में 30 मीटर चौड़ी सड़क का प्रावधान है। इसके आधार पर भवन अनुमति निरस्त कर दी गई और बाद में ध्वस्तीकरण नोटिस जारी कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने पकड़ा निगम का फर्जीवाड़ा 

अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि—

  • भवन अनुमति जारी करने से पहले निगम के भवन निरीक्षक ने स्वयं स्थल का सत्यापन किया था।
  • निरीक्षण रिपोर्ट में 18 मीटर सड़क का उल्लेख किया गया था।
  • अनुमति उसी आधार पर विधिवत स्वीकृत हुई थी।
  • रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि याचिकाकर्ताओं ने झूठा बयान दिया हो या कोई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाया हो।

नियम 25 का इस्तेमाल नहीं हो सकता

हाईकोर्ट ने कहा कि मध्यप्रदेश भूमि विकास नियम, 2012 के नियम 25 के तहत भवन अनुमति तभी रद्द की जा सकती है जब वह झूठे तथ्यों, मिथ्या कथन या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर प्राप्त की गई हो।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब निगम का अपना निरीक्षक स्थल का सत्यापन कर फाइल स्वीकृति के लिए भेजता है, तब बाद में उसी अनुमति को आवेदक की धोखाधड़ी का परिणाम नहीं कहा जा सकता।

निगम की चुप्पी पर भी सवाल

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि निगम का दावा है कि निरीक्षण रिपोर्ट गलत थी या किसी अधिकारी ने नियमों के विपरीत कार्य किया, तो यह स्पष्ट नहीं किया गया कि संबंधित अधिकारी के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई।इस संबंध में निगम की चुप्पी ने उसके बचाव को कमजोर किया।

समानता के अधिकार का उल्लंघन

कोर्ट ने पाया कि उसी क्षेत्र के अन्य भवनों—जैसे मकान क्रमांक 13/1, 6/1 तथा ब्लॉक 31—को भी 18 मीटर सड़क के आधार पर भवन अनुमति दी गई थी।

महत्वपूर्ण बात यह रही कि—

  • उन भवनों की अनुमति रद्द नहीं की गई।
  • उनके विरुद्ध कोई ध्वस्तीकरण कार्रवाई नहीं हुई।

अदालत ने माना कि केवल याचिकाकर्ताओं को निशाना बनाना अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन और Hostile Discrimination (शत्रुतापूर्ण भेदभाव) है।

संपत्ति के अधिकार पर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी नागरिक ने वैध अनुमति के आधार पर भारी निवेश कर निर्माण कर लिया हो, तब बिना धोखाधड़ी सिद्ध किए अनुमति वापस लेना मनमाना और अनुचित है।

अदालत के अनुसार ऐसी कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत संरक्षित संपत्ति के अधिकार का भी उल्लंघन करती है।

हाईकोर्ट ने खारिज किये आदेश

अदालत ने 9 मई 2019 का अनुमति निरस्तीकरण आदेश, 11 सितंबर 2019 और 4 फरवरी 2020 के ध्वस्तीकरण नोटिस निरस्त करके 27 जुलाई 2017 की भवन अनुमति बहाल की। साथ ही नगर निगम को याचिकाकर्ताओं की संपत्ति के विरुद्ध किसी भी प्रकार की जबरन या ध्वस्तीकरण कार्रवाई से रोका।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नगर निगम भविष्य में कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा, लेकिन ऐसी कार्रवाई समान परिस्थितियों वाले अन्य संपत्ति मालिकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करते हुए, जनहित में और बिना किसी भेदभाव के की जानी चाहिए।


हाईकोर्ट का आदेश देखें     W.P. No. 3547/2020


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